Friday, 16 October 2026

उलू ध्वनि: बंगाल की परंपरा में मंगल और उल्लास की गूंज



बंगाल की दुर्गा पूजा में शंख की ध्वनि और ढाक की थाप के बीच जब महिलाओं की ‘उलू ध्वनि’ गूंजती है, तो पूरा माहौल भक्ति, उल्लास और शुभता से सराबोर हो उठता है। जीभ को तेजी से हिलाकर निकाली जाने वाली यह अनूठी ध्वनि बंगाली संस्कृति की ऐसी पहचान है, जो हर उत्सव में नई ऊर्जा भर देती है।

मां दुर्गा की आरती हो, सिंदूर खेला का उल्लास या देवी की विदाई का भावुक पल—उलू ध्वनि हर अवसर को खास बना देती है। यही नहीं, शादी-ब्याह, बच्चे के जन्म और गृह प्रवेश जैसे मांगलिक अवसरों पर भी महिलाएं इस परंपरा के जरिए खुशियों का इजहार करती हैं।

सदियों पुरानी यह परंपरा महज एक ध्वनि नहीं, बल्कि आस्था, मंगलकामना और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत गूंज है। इसमें झलकती है महिलाओं की सामूहिक भागीदारी, उत्सवधर्मिता और अपनी जड़ों से जुड़ी रहने की भावना। शंख और ढाक के साथ गूंजती उलू ध्वनि बंगाल के हर उत्सव को एक अलग पहचान देती है।

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Thursday, 15 October 2026

धुनुची की थिरकन, उलू ध्वनि की गूंज… बंगाली दुर्गोत्सव की असली पहचान





ढाक की थाप पर थिरकते कदम, धुएं के बीच आस्था की अभिव्यक्ति और महिलाओं की उलू ध्वनि से गूंजता पूजा पंडाल… बंगाली दुर्गोत्सव में भक्ति और परंपरा का दिखता है अनूठा संगम

बंगाल की दुर्गा पूजा सिर्फ देवी आराधना का पर्व नहीं, बल्कि यहां की समृद्ध लोकसंस्कृति, परंपरा और सामूहिक उल्लास का उत्सव भी है। पूजा पंडालों में ढाक की गूंजती थाप के बीच धुनुची नृत्य और महिलाओं की उलू ध्वनि उत्सव में चार चांद लगा देती है। ये दोनों परंपराएं बंगाली दुर्गोत्सव की ऐसी खास पहचान हैं, जिनके बिना उत्सव का रंग अधूरा लगता है।

दुर्गोत्सव के दौरान धुनुची नृत्य श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहता है। मिट्टी के विशेष पात्र धुनुची में जलते नारियल के छिलकों और धूप से उठता सुगंधित धुआं, ढाक की तेज थाप और उस पर थिरकते श्रद्धालुओं के कदम पंडाल के माहौल को भक्तिमय बना देते हैं। महिलाएं लाल किनारी वाली सफेद साड़ी और पुरुष पारंपरिक धोती-कुर्ते में इस नृत्य के जरिए मां दुर्गा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।

धुनुची का इस्तेमाल पहले पूजा के दौरान धूप जलाने और वातावरण को सुगंधित करने के लिए किया जाता था। समय के साथ इस परंपरा में संगीत और नृत्य का मेल हुआ और धुनुची नाच बंगाल की सांस्कृतिक पहचान बन गया। आज महाआरती और दुर्गोत्सव के विशेष अवसरों पर इसका आयोजन श्रद्धालुओं में खास उत्साह भर देता है।

त्रिलोकीमां कालीबाड़ी, राजेन्द्र नगर रायपुर में धुनुची नृत्य करते हुए मेरी तस्वीर

धुनुची नृत्य के साथ महिलाओं की उलू ध्वनि दुर्गोत्सव के उल्लास को नई ऊंचाई देती है। जीभ को तेजी से हिलाकर निकाली जाने वाली यह पारंपरिक ध्वनि बंगाल में शुभता, मंगल और खुशी का प्रतीक मानी जाती है। मां दुर्गा की आरती, सिंदूर खेला और देवी की विदाई के दौरान जब महिलाएं उलू ध्वनि करती हैं, तो शंख और ढाक की आवाज के साथ पूरा वातावरण उत्सवी रंग में रंग जाता है।

यह परंपरा केवल दुर्गा पूजा तक सीमित नहीं है। बंगाली समाज में विवाह, बच्चे के जन्म और गृह प्रवेश जैसे मांगलिक अवसरों पर भी उलू ध्वनि के जरिए खुशी और शुभकामनाएं व्यक्त की जाती हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी बंगाल की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है।

धुनुची नृत्य और उलू ध्वनि, दोनों ही बंगाली दुर्गोत्सव की विशिष्ट पहचान हैं। एक ओर धुनुची के धुएं के बीच थिरकते कदम भक्ति और समर्पण का भाव जगाते हैं, तो दूसरी ओर उलू ध्वनि शुभता और उत्साह का संदेश देती है। इन परंपराओं में धार्मिक आस्था के साथ बंगाल की लोककला और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की झलक भी मिलती है। धुनुची नृत्य केवल कदमों की थिरकन नहीं, बल्कि माँ दुर्गा के प्रति अटूट आस्था, समर्पण और आनंद की एक अनूठी अभिव्यक्ति है।

ढाक की थाप, धुनुची की लय और उलू ध्वनि की गूंज के बीच बंगाल का दुर्गोत्सव अपनी अलग छटा बिखेरता है। यही परंपराएं इस पर्व को केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और सामूहिक उल्लास का जीवंत उत्सव बनाती हैं।