रिश्तों को भी देखभाल की ज़रूरत होती है
सुजाता साहा
रिश्तों को भी उसी तरह प्यार, समय और विश्वास से सींचना पड़ता है,
जैसे एक पौधे को बढ़ने के लिए हर रोज़ पानी और देखभाल की ज़रूरत होती है।
आप भी सोच रहे होंगे कि मैं भी कहां रिश्तों की तुलना एक पौधे से कर रही हूं लेकिन ये सच है। जिस तरह एक नन्हा सा बीज रातों-रात विशाल पेड़ नहीं बनता, उसी तरह कोई भी रिश्ता अचानक से गहरा नहीं होता। उसके लिए प्यार, समय , विश्वास, धैर्य और देखभाल की ज़रूरत होती है। जैसे सूरज की रोशनी के बिना पौधा मुरझा जाता है, वैसे ही बिना प्यार और गर्माहट के रिश्ता बेजान हो जाता है। यह वह ऊर्जा है जो दो लोगों को जोड़े रखती है। हाथ की लकीरों से रिश्ते नहीं बनते, बल्कि उन हाथों से जब किसी का हाथ थामकर मुश्किलों में साथ चला जाता है, तब रिश्ता बनता है।
पौधे को रोज़ पानी चाहिए होता है, न कि महीने में एक बार बाल्टी भर के। रिश्तों में भी 'क्वालिटी टाइम' की निरंतरता मायने रखती है। बातचीत वह पानी है जो रिश्तों की जड़ों को सूखने नहीं देता। जब संवाद बंद हो जाता है, तो गलतफहमियों की परतें जमने लगती हैं। हम अक्सर बड़े मौकों (जैसे जन्मदिन या एनिवर्सरी) पर तो बहुत प्यार दिखाते हैं, लेकिन रोज़मर्रा की ज़िंदगी में छोटे-छोटे 'थैंक यू' या 'कैसे हो?' कहना भूल जाते हैं। जबकि रिश्ते इन्हीं छोटे पलों से सांस लेते हैं, साथ बिताए छोटे-छोटे पल ही जड़ों को मज़बूत करते हैं। मिट्टी जितनी उपजाऊ होगी, पौधा उतना ही स्वस्थ रहेगा। विश्वास वह आधार है जिस पर पूरा रिश्ता टिका होता है। अगर नींव में शक की दीमक लग जाए, तो बड़े से बड़ा रिश्ता ढह जाता है। अगर समय पर पुरानी कड़वाहटों को नहीं हटाया जाए, तो नई खुशियों के लिए जगह ही नहीं बचती। कभी-कभी पौधे की सूखी पत्तियों को काटना पड़ता है ताकि वह और बढ़ सके। वैसे ही, रिश्तों में माफ़ी और समझदारी की ज़रूरत होती है। गलतफहमियों को दूर करना और एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करना ही असली देखभाल है।
रिश्ते बनाना तो हुनर है, लेकिन रिश्तों को निभाना एक साधना है। जैसे माली को पता होता है कि किस मौसम में पौधे को कैसी ज़रूरत है, वैसे ही हमें भी रिश्तों के उतार-चढ़ाव में धैर्य रखना चाहिए। रिश्तों की यह 'बागवानी' वाकई थका देने वाली हो सकती है, लेकिन जब वह पौधा फल और छाया देने लगता है, तो माली की सारी मेहनत सफल हो जाती है।
रिश्ता 'बनाना' सिर्फ एक शुरुआत है, उसे 'जीना' और 'सींचना' ही असली कला है।


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