Wednesday, 24 June 2026

क्या भारत बूढ़ा हो रहा है?

 भारत में घटती जनसंख्या संतुलन की नई चुनौती

- सुजाता साहा

भारत लंबे समय तक जनसंख्या विस्फोट की चिंता से जूझता रहा है, लेकिन अब देश एक नए जनसांख्यिकीय मोड़ पर खड़ा है। दशकों तक जहां बढ़ती आबादी को विकास की सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था, वहीं आज जन्मदर और कुल प्रजनन दर में लगातार गिरावट नीति-निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों के लिए नई चिंता का विषय बनती जा रही है। यह परिवर्तन सामाजिक प्रगति का संकेत भी है और भविष्य की चुनौतियों की चेतावनी भी।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण तथा सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर घटकर लगभग 1.9 पर पहुंच गई है, जबकि जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए 2.1 की प्रजनन दर आवश्यक मानी जाती है। इसका अर्थ है कि भारत पहली बार प्रतिस्थापन स्तर ( रिप्लेसमेंट लेवल) से नीचे पहुंच चुका है। 1980 के दशक में भारत की प्रजनन दर 4.5 से अधिक थी, जो आज आधे से भी कम रह गई है। शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार और परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता इस परिवर्तन के प्रमुख कारण हैं।

भारत में जन्मदर और मृत्युदर दोनों में लगातार कमी आई है। वर्ष 1960 में जहां जन्म दर प्रति हजार आबादी पर लगभग 43 थी, वहीं आज यह घटकर लगभग 16 रह गई है। मृत्युदर भी 22 प्रति हजार से घटकर लगभग 6.5 प्रति हजार पर पहुंच गई है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि भारत जनसांख्यिकीय संक्रमण के अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है।

हालांकि भारत की स्थिति अभी भी दक्षिण कोरिया, जापान, चीन और इटली जैसे देशों से बेहतर है, लेकिन संकेत चिंताजनक हैं। दक्षिण कोरिया की प्रजनन दर 0.7, चीन की लगभग 1.0 तथा जापान और इटली की 1.2 के आसपास है। इन देशों के अनुभव बताते हैं कि अत्यधिक कम जन्मदर किसी भी राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक ढांचे को गहरे स्तर पर प्रभावित कर सकती है।

टेस्ला और स्पेस एक्स के प्रमुख एलन मस्क कई बार सार्वजनिक मंचों पर चेतावनी दे चुके हैं कि भविष्य में मानव सभ्यता के सामने सबसे बड़ा संकट जनसंख्या विस्फोट नहीं, बल्कि जनसंख्या में अत्यधिक गिरावट हो सकती है। उनके अनुसार यदि जन्म दर लंबे समय तक प्रतिस्थापन स्तर से नीचे बनी रहती है तो कई देशों की अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ सकती है और सामाजिक संरचना असंतुलित हो सकती है। भले ही सभी विशेषज्ञ उनकी राय से पूरी तरह सहमत न हों, लेकिन दुनिया के अनेक देशों का अनुभव इस चिंता को पूरी तरह खारिज भी नहीं करता।


जापान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या कुल आबादी के लगभग एक-तिहाई तक पहुंच चुकी है। श्रमिकों की कमी के कारण उद्योग प्रभावित हो रहे हैं और सरकार को पेंशन तथा स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी खर्च करना पड़ रहा है। दक्षिण कोरिया में कम जन्मदर के कारण कई स्कूल बंद होने की स्थिति में पहुंच गए हैं। चीन दशकों तक लागू एक-बच्चा नीति के दुष्परिणामों से जूझ रहा है, जहां कार्यशील आयु वर्ग की आबादी घट रही है और वृद्ध जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। इटली और यूरोप के कई देशों में गांव खाली हो रहे हैं, स्कूल बंद हो रहे हैं और श्रमिकों की कमी को पूरा करने के लिए प्रवासियों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।

भारत में जन्म दर में गिरावट के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में वृद्धि, विवाह की बढ़ती आयु, शहरीकरण, बच्चों के पालन-पोषण की बढ़ती लागत, परिवार नियोजन की उपलब्धता तथा करियर को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति इसके प्रमुख कारण हैं। आर्थिक असुरक्षा और रोजगार संबंधी चिंताएं भी युवा दंपतियों को छोटे परिवार की ओर प्रेरित कर रही हैं।

लेकिन घटती जन्मदर को केवल संकट के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इसके सकारात्मक पक्ष भी हैं। छोटे परिवारों में बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक निवेश संभव होता है। महिलाओं को करियर के बेहतर अवसर मिलते हैं। संसाधनों पर दबाव कम होता है और प्रति व्यक्ति आय बढ़ने की संभावना रहती है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ इसे सामाजिक विकास का स्वाभाविक परिणाम मानते हैं।

चुनौती तब उत्पन्न होती है जब जन्मदर लंबे समय तक बहुत नीचे बनी रहती है। ऐसी स्थिति में कार्यशील आयु वर्ग की आबादी घटने लगती है, जबकि बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ती है। इससे पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर भारी दबाव पड़ता है। उद्योगों को श्रमिकों की कमी का सामना करना पड़ता है और आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक भारत में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या 30 करोड़ से अधिक हो सकती है।

फिलहाल भारत के सामने तत्काल संकट नहीं है। देश के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है और औसत आयु लगभग 29 वर्ष है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन यदि अगले दो से तीन दशकों तक प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे बनी रहती है, तो भारत को भी जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

इसलिए आवश्यकता किसी अतिवादी जनसंख्या नीति की नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण की है। सरकार को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं, मातृत्व-पितृत्व अवकाश, सस्ती बाल देखभाल सेवाओं और युवा परिवारों के लिए आवास सहायता जैसी नीतियों पर ध्यान देना होगा। साथ ही वृद्धजन कल्याण और सामाजिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत बनाना होगा। दूसरी ओर समाज को महिलाओं के करियर और परिवार दोनों का सम्मान करने वाली सोच विकसित करनी होगी तथा बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी में पुरुषों की समान भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।

भारत आज जनसंख्या विस्फोट नहीं, बल्कि जनसंख्या संतुलन की चुनौती का सामना कर रहा है। घटती जन्मदर सामाजिक प्रगति का प्रमाण है, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह स्थिति न तो पूर्ण संकट है और न ही केवल अवसर। यह एक चेतावनी भी है और अवसर भी। यदि भारत समय रहते अपनी युवा शक्ति को कौशल, रोजगार, उत्पादकता और नवाचार से जोड़ने में सफल होता है, तो वह जनसांख्यिकीय परिवर्तन को विकास की नई ऊर्जा में बदल सकता है। अन्यथा आने वाले दशकों में वही समस्या भारत के सामने खड़ी हो सकती है, जिससे आज दुनिया के कई विकसित देश जूझ रहे हैं। जनसंख्या का संतुलन ही किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति है, और भारत को इसी संतुलन को बनाए रखने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

@SUJATASAHA

TRUE SOLDIER में प्रकाशित मेरा लेखा


 

Wednesday, 17 June 2026

खमतराई रेलवे क्रॉसिंग : वर्षों से जाम की मार झेल रहे रहवासी, राहत का इंतजार

- सुजाता साहा

रायपुर-बिलासपुर मुख्य रेलवे मार्ग पर स्थित खमतराई रेलवे क्रॉसिंग राजधानी की सबसे गंभीर यातायात समस्याओं में से एक बन चुकी है। देश के प्रमुख रेल मार्गों में शामिल इस लाइन पर प्रतिदिन 100 से अधिक ट्रेनों का आवागमन होता है। परिणामस्वरूप फाटक बार-बार बंद रहता है और एक बार फाटक बंद होने के बाद कई बार 4 से 5 ट्रेनों के गुजरने तक लोगों को इंतजार करना पड़ता है।

स्थिति ऐसी है कि भीषण गर्मी, बारिश और कड़ाके की ठंड के बीच स्कूली बच्चे, मरीज, वाहन चालक और आम राहगीर 20 से 30 मिनट तक सड़क पर खड़े रहने को मजबूर हो जाते हैं। इससे न केवल समय की बर्बादी होती है, बल्कि आपातकालीन परिस्थितियों में लोगों को गंभीर परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है।

खमतराई, डब्ल्यूआरएस कॉलोनी, श्रीनगर, गुढ़ियारी, गोगांव और शिवानंद नगर सहित आसपास के क्षेत्रों की लगभग 65 हजार से अधिक आबादी इस मार्ग पर निर्भर है। क्षेत्र में स्कूल, अस्पताल, थोक बाजार और अनेक व्यावसायिक प्रतिष्ठान स्थित होने के कारण दिनभर यातायात का भारी दबाव बना रहता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि वर्षों से लगने वाले जाम के कारण रोजाना समय और ईंधन दोनों की भारी बर्बादी हो रही है।

हाल ही में कचना रेलवे ओवरब्रिज के शुरू होने से उस क्षेत्र के लोगों को बड़ी राहत मिली है। इसके बाद अब खमतराई क्षेत्र के रहवासी भी लंबे समय से लंबित अंडरब्रिज अथवा ओवरब्रिज परियोजना को शीघ्र प्रारंभ करने की मांग कर रहे हैं।

खमतराई रेलवे क्रॉसिंग पर अंडरब्रिज निर्माण की परियोजना कई वर्षों से प्रस्तावित है, लेकिन अब तक धरातल पर नहीं उतर सकी है। हालांकि रेलवे जोन मुख्यालय द्वारा इसकी ड्राइंग एवं डिजाइन को मंजूरी प्रदान कर दी गई है। विभागीय सूत्रों के अनुसार आगामी एक माह में टेंडर प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है तथा वर्ष 2027 तक परियोजना पूर्ण करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

ज्ञात हो कि यह परियोजना नई नहीं है। वर्ष 2016-17 में इसे लगभग 6 करोड़ रुपये की लागत से स्वीकृति मिली थी, लेकिन वित्तीय और प्रशासनिक कारणों से कार्य प्रारंभ नहीं हो सका। लगभग एक दशक की देरी के कारण अब इसकी अनुमानित लागत बढ़कर 17 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गई है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस दौरान क्षेत्र की जनता लगातार परेशान होती रही, लेकिन समस्या के स्थायी समाधान के लिए न तो जनप्रतिनिधियों ने अपेक्षित पहल की और न ही किसी बड़े सामाजिक संगठन ने प्रभावी दबाव बनाया। इस अवधि में राज्य में दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों की सरकारें रहीं, फिर भी परियोजना फाइलों से बाहर नहीं निकल सकी।

परियोजना में हुई देरी का खामियाजा दोहरी तरह से जनता को भुगतना पड़ा है। एक ओर निर्माण लागत लगभग तीन गुना तक बढ़ गई, वहीं दूसरी ओर हजारों नागरिक वर्षों से जाम, समय की बर्बादी और असुविधा झेलने को मजबूर हैं। क्षेत्रवासियों को उम्मीद है कि जल्द ही निर्माण कार्य शुरू होगा और उन्हें इस पुरानी समस्या से स्थायी राहत मिलेगी।

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Saturday, 30 May 2026

रिश्तों को प्यार-विश्वास से सींचना जरूरी

रिश्तों को भी देखभाल की ज़रूरत होती है

सुजाता साहा 


रिश्तों को भी उसी तरह प्यार, समय और विश्वास से सींचना पड़ता है,

जैसे एक पौधे को बढ़ने के लिए हर रोज़ पानी और देखभाल की ज़रूरत होती है।

आप भी सोच रहे होंगे कि मैं भी कहां रिश्तों की तुलना एक पौधे से कर रही हूं लेकिन ये सच है। जिस तरह एक नन्हा सा बीज रातों-रात विशाल पेड़ नहीं बनता, उसी तरह कोई भी रिश्ता अचानक से गहरा नहीं होता। उसके लिए प्यार, समय , विश्वास,  धैर्य और देखभाल की ज़रूरत होती है। जैसे सूरज की रोशनी के बिना पौधा मुरझा जाता है, वैसे ही बिना प्यार और गर्माहट के रिश्ता बेजान हो जाता है। यह वह ऊर्जा है जो दो लोगों को जोड़े रखती है। हाथ की लकीरों से रिश्ते नहीं बनते, बल्कि उन हाथों से जब किसी का हाथ थामकर मुश्किलों में साथ चला जाता है, तब रिश्ता बनता है।

पौधे को रोज़ पानी चाहिए होता है, न कि महीने में एक बार बाल्टी भर के। रिश्तों में भी 'क्वालिटी टाइम' की निरंतरता मायने रखती है। बातचीत वह पानी है जो रिश्तों की जड़ों को सूखने नहीं देता। जब संवाद बंद हो जाता है, तो गलतफहमियों की परतें जमने लगती हैं। हम अक्सर बड़े मौकों (जैसे जन्मदिन या एनिवर्सरी) पर तो बहुत प्यार दिखाते हैं, लेकिन रोज़मर्रा की ज़िंदगी में छोटे-छोटे 'थैंक यू' या 'कैसे हो?' कहना भूल जाते हैं। जबकि रिश्ते इन्हीं छोटे पलों से सांस लेते हैं, साथ बिताए छोटे-छोटे पल ही जड़ों को मज़बूत करते हैं। मिट्टी जितनी उपजाऊ होगी, पौधा उतना ही स्वस्थ रहेगा। विश्वास वह आधार है जिस पर पूरा रिश्ता टिका होता है। अगर नींव में शक की दीमक लग जाए, तो बड़े से बड़ा रिश्ता ढह जाता है। अगर समय पर पुरानी कड़वाहटों को नहीं हटाया जाए, तो नई खुशियों के लिए जगह ही नहीं बचती। कभी-कभी पौधे की सूखी पत्तियों को काटना पड़ता है ताकि वह और बढ़ सके। वैसे ही, रिश्तों में माफ़ी और समझदारी की ज़रूरत होती है। गलतफहमियों को दूर करना और एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करना ही असली देखभाल है।

रिश्ते बनाना तो हुनर है, लेकिन रिश्तों को निभाना एक साधना है। जैसे माली को पता होता है कि किस मौसम में पौधे को कैसी ज़रूरत है, वैसे ही हमें भी रिश्तों के उतार-चढ़ाव में धैर्य रखना चाहिए।  रिश्तों की यह 'बागवानी' वाकई थका देने वाली हो सकती है, लेकिन जब वह पौधा फल और छाया देने लगता है, तो माली की सारी मेहनत सफल हो जाती है।

रिश्ता 'बनाना' सिर्फ एक शुरुआत है, उसे 'जीना' और 'सींचना' ही असली कला है।



Friday, 29 May 2026

दहेज : सभ्य समाज की असभ्य सच्चाई

आधुनिक समाज में दहेज की बदलती तस्वीर

 सुजाता साहा



12 मई 2026 को भोपाल की चर्चित मॉडल ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत ने पूरे समाज के सामने एक बार फिर वही पुराना, लेकिन बेहद गंभीर सवाल खड़ा कर दिया, आखिर कब तक बेटियाँ दहेज की भेंट चढ़ती रहेंगी?

इस घटना ने समाज के उस वर्ग को भी कठघरे में खड़ा कर दिया, जिसे शिक्षित, सभ्य और प्रगतिशील माना जाता है। विडंबना यह है कि समाज का निम्न और मध्यम वर्ग अक्सर इसी तथाकथित “सभ्य समाज” का अनुसरण करता है। ऐसे में यह प्रश्न और गंभीर हो जाता है कि क्या दहेज जैसी कुरीतियाँ अब केवल ग्रामीण या अशिक्षित समाज की समस्या रह गई हैं?

सच्चाई यह है कि आज दहेज का सबसे परिष्कृत और भयावह रूप शिक्षित तथा शहरी समाज में दिखाई देता है। दहेज ने अब अपना पारंपरिक स्वरूप बदल लिया है। इसे “प्रतिष्ठा”, “स्टेटस”, “शगुन”, “उपहार” और “बेटी को खुशी से दिया गया सामान” जैसे सभ्य शब्दों की आड़ में स्वीकार्यता दी जा रही है। आधुनिक समाज में दहेज अब खुलकर माँगी जाने वाली वस्तु नहीं, बल्कि सामाजिक दिखावे और आर्थिक लेन-देन का एक सुनियोजित माध्यम बन चुका है।

भारत में दहेज से जुड़ी मौतें आज भी एक गंभीर सामाजिक समस्या बनी हुई हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के हालिया आँकड़े इसकी भयावहता को स्पष्ट करते हैं —

वर्ष 2024 में भारत में दहेज से जुड़ी 5,737 महिलाओं की मौतें दर्ज की गईं। अर्थात औसतन हर 90 मिनट में एक महिला दहेज हिंसा का शिकार हुई। वर्ष 2023 में दहेज मृत्यु के 6,156 मामले दर्ज किए गए थे।

उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे अधिक प्रभावित राज्य रहा, जहाँ 2024 में 2,038 तथा 2023 में 2,122 मामले दर्ज हुए। बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड भी दहेज हिंसा से प्रभावित प्रमुख राज्यों में शामिल हैं।

विडंबना यह है कि जिस शिक्षा से संवेदनशीलता, समानता और सामाजिक चेतना की अपेक्षा की जाती थी, वही आज दहेज के नए बाज़ार की नींव बनती जा रही है। दूल्हे की डिग्री, नौकरी, वेतन और सामाजिक हैसियत के आधार पर उसका “रेट” तय किया जाता है। आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर और उच्च पदों पर कार्यरत युवकों के लिए दहेज की रकम और भव्य आयोजनों की अपेक्षाएँ भी उतनी ही बढ़ जाती हैं। मानो विवाह कोई पवित्र संबंध नहीं, बल्कि एक आर्थिक सौदा हो।

आज शहरी समाज में दहेज को सीधे-सीधे दहेज नहीं कहा जाता। महंगी गाड़ियाँ, आलीशान होटलों में शादियाँ, विदेशी हनीमून पैकेज, ब्रांडेड उपहार और लाखों रुपये का खर्च सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बना दिए गए हैं। कई बार लड़के पक्ष द्वारा बिना कुछ कहे ही ऐसा वातावरण बना दिया जाता है कि लड़की के माता-पिता अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करने को मजबूर हो जाते हैं।

यह मानसिक दबाव दहेज का ही आधुनिक और अधिक खतरनाक रूप है। दुखद यह भी है कि कई परिवार यह भ्रम पाल लेते हैं कि अधिक खर्च और महंगे उपहार उनकी बेटी को ससुराल में सम्मान और सुरक्षा दिला देंगे, जबकि अक्सर इसका उल्टा होता है। अपेक्षाएँ लगातार बढ़ती जाती हैं और उनके पूरा न होने पर प्रताड़ना शुरू हो जाती है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि शिक्षित मध्यम वर्ग, जो स्वयं को जागरूक और प्रगतिशील मानता है, वही इस दिखावे और प्रतिस्पर्धा की दौड़ में सबसे अधिक फँसता जा रहा है। शादी अब संस्कार कम और सामाजिक प्रदर्शन अधिक बनती जा रही है। परिणामस्वरूप अनेक परिवार कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं, लेकिन फिर भी इसे “सम्मान” का प्रश्न मानकर चुप रहते हैं।

दरअसल, जब कोई शिक्षित परिवार दहेज स्वीकार करता है, तो वह अनजाने में यह स्वीकार कर लेता है कि उसके बेटे के संस्कार, व्यक्तित्व और मानवीय मूल्य धन-दौलत से कमतर हैं। यह सोच स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के बजाय “आर्थिक बोझ” या “निवेश” के रूप में प्रस्तुत करती है। यही मानसिकता दहेज प्रथा को जीवित रखती है।

कानून अपनी जगह मौजूद हैं, लेकिन केवल कानूनी प्रावधान इस समस्या का समाधान नहीं कर सकते। जब तक समाज स्वयं दहेज को “रीति-रिवाज” या “प्रतिष्ठा” मानना बंद नहीं करेगा, तब तक बेटियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकती। आवश्यकता इस बात की है कि युवा पीढ़ी स्वयं आगे आकर यह संकल्प ले कि उनकी शिक्षा बिकाऊ नहीं है और विवाह किसी आर्थिक लेन-देन का माध्यम नहीं बनेगा।

आज सबसे अधिक आवश्यकता “शून्य दहेज” और “सादगीपूर्ण विवाह” को सामाजिक सम्मान देने की है। असली शिक्षा वही है, जो व्यक्ति को इंसान की “कीमत” नहीं, बल्कि उसकी “वैल्यू” समझना सिखाए। जब तक समाज सम्मान को धन और दिखावे से जोड़कर देखता रहेगा, तब तक दहेज केवल अपना नाम बदलकर हमारे बीच जीवित रहेगा और समाज को भीतर ही भीतर खोखला करता रहेगा।

भोपाल की मॉडल ट्विशा शर्मा जैसी चर्चित घटनाएँ केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं हैं, बल्कि वे उस सामाजिक मानसिकता का आईना हैं, जो आज भी बेटियों को समान अधिकार और सम्मान देने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हो पाई है।

दहेज केवल एक कुरीति नहीं, बल्कि महिलाओं के जीवन, सम्मान और स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा है। कानून से अधिक आवश्यकता सामाजिक चेतना और मानसिक परिवर्तन की है। जिस दिन समाज विवाह को प्रदर्शन नहीं, बल्कि समानता और सम्मान का संबंध मानने लगेगा, उसी दिन दहेज जैसी अमानवीय प्रथा वास्तव में समाप्त होगी।

स्त्रीधारा में प्रकाशित