Saturday, 30 May 2026

रिश्तों को प्यार-विश्वास से सींचना जरूरी

रिश्तों को भी देखभाल की ज़रूरत होती है

सुजाता साहा 


रिश्तों को भी उसी तरह प्यार, समय और विश्वास से सींचना पड़ता है,

जैसे एक पौधे को बढ़ने के लिए हर रोज़ पानी और देखभाल की ज़रूरत होती है।

आप भी सोच रहे होंगे कि मैं भी कहां रिश्तों की तुलना एक पौधे से कर रही हूं लेकिन ये सच है। जिस तरह एक नन्हा सा बीज रातों-रात विशाल पेड़ नहीं बनता, उसी तरह कोई भी रिश्ता अचानक से गहरा नहीं होता। उसके लिए प्यार, समय , विश्वास,  धैर्य और देखभाल की ज़रूरत होती है। जैसे सूरज की रोशनी के बिना पौधा मुरझा जाता है, वैसे ही बिना प्यार और गर्माहट के रिश्ता बेजान हो जाता है। यह वह ऊर्जा है जो दो लोगों को जोड़े रखती है। हाथ की लकीरों से रिश्ते नहीं बनते, बल्कि उन हाथों से जब किसी का हाथ थामकर मुश्किलों में साथ चला जाता है, तब रिश्ता बनता है।

पौधे को रोज़ पानी चाहिए होता है, न कि महीने में एक बार बाल्टी भर के। रिश्तों में भी 'क्वालिटी टाइम' की निरंतरता मायने रखती है। बातचीत वह पानी है जो रिश्तों की जड़ों को सूखने नहीं देता। जब संवाद बंद हो जाता है, तो गलतफहमियों की परतें जमने लगती हैं। हम अक्सर बड़े मौकों (जैसे जन्मदिन या एनिवर्सरी) पर तो बहुत प्यार दिखाते हैं, लेकिन रोज़मर्रा की ज़िंदगी में छोटे-छोटे 'थैंक यू' या 'कैसे हो?' कहना भूल जाते हैं। जबकि रिश्ते इन्हीं छोटे पलों से सांस लेते हैं, साथ बिताए छोटे-छोटे पल ही जड़ों को मज़बूत करते हैं। मिट्टी जितनी उपजाऊ होगी, पौधा उतना ही स्वस्थ रहेगा। विश्वास वह आधार है जिस पर पूरा रिश्ता टिका होता है। अगर नींव में शक की दीमक लग जाए, तो बड़े से बड़ा रिश्ता ढह जाता है। अगर समय पर पुरानी कड़वाहटों को नहीं हटाया जाए, तो नई खुशियों के लिए जगह ही नहीं बचती। कभी-कभी पौधे की सूखी पत्तियों को काटना पड़ता है ताकि वह और बढ़ सके। वैसे ही, रिश्तों में माफ़ी और समझदारी की ज़रूरत होती है। गलतफहमियों को दूर करना और एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करना ही असली देखभाल है।

रिश्ते बनाना तो हुनर है, लेकिन रिश्तों को निभाना एक साधना है। जैसे माली को पता होता है कि किस मौसम में पौधे को कैसी ज़रूरत है, वैसे ही हमें भी रिश्तों के उतार-चढ़ाव में धैर्य रखना चाहिए।  रिश्तों की यह 'बागवानी' वाकई थका देने वाली हो सकती है, लेकिन जब वह पौधा फल और छाया देने लगता है, तो माली की सारी मेहनत सफल हो जाती है।

रिश्ता 'बनाना' सिर्फ एक शुरुआत है, उसे 'जीना' और 'सींचना' ही असली कला है।



Friday, 29 May 2026

दहेज : सभ्य समाज की असभ्य सच्चाई

आधुनिक समाज में दहेज की बदलती तस्वीर

 सुजाता साहा



12 मई 2026 को भोपाल की चर्चित मॉडल ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत ने पूरे समाज के सामने एक बार फिर वही पुराना, लेकिन बेहद गंभीर सवाल खड़ा कर दिया, आखिर कब तक बेटियाँ दहेज की भेंट चढ़ती रहेंगी?

इस घटना ने समाज के उस वर्ग को भी कठघरे में खड़ा कर दिया, जिसे शिक्षित, सभ्य और प्रगतिशील माना जाता है। विडंबना यह है कि समाज का निम्न और मध्यम वर्ग अक्सर इसी तथाकथित “सभ्य समाज” का अनुसरण करता है। ऐसे में यह प्रश्न और गंभीर हो जाता है कि क्या दहेज जैसी कुरीतियाँ अब केवल ग्रामीण या अशिक्षित समाज की समस्या रह गई हैं?

सच्चाई यह है कि आज दहेज का सबसे परिष्कृत और भयावह रूप शिक्षित तथा शहरी समाज में दिखाई देता है। दहेज ने अब अपना पारंपरिक स्वरूप बदल लिया है। इसे “प्रतिष्ठा”, “स्टेटस”, “शगुन”, “उपहार” और “बेटी को खुशी से दिया गया सामान” जैसे सभ्य शब्दों की आड़ में स्वीकार्यता दी जा रही है। आधुनिक समाज में दहेज अब खुलकर माँगी जाने वाली वस्तु नहीं, बल्कि सामाजिक दिखावे और आर्थिक लेन-देन का एक सुनियोजित माध्यम बन चुका है।

भारत में दहेज से जुड़ी मौतें आज भी एक गंभीर सामाजिक समस्या बनी हुई हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के हालिया आँकड़े इसकी भयावहता को स्पष्ट करते हैं —

वर्ष 2024 में भारत में दहेज से जुड़ी 5,737 महिलाओं की मौतें दर्ज की गईं। अर्थात औसतन हर 90 मिनट में एक महिला दहेज हिंसा का शिकार हुई। वर्ष 2023 में दहेज मृत्यु के 6,156 मामले दर्ज किए गए थे।

उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे अधिक प्रभावित राज्य रहा, जहाँ 2024 में 2,038 तथा 2023 में 2,122 मामले दर्ज हुए। बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड भी दहेज हिंसा से प्रभावित प्रमुख राज्यों में शामिल हैं।

विडंबना यह है कि जिस शिक्षा से संवेदनशीलता, समानता और सामाजिक चेतना की अपेक्षा की जाती थी, वही आज दहेज के नए बाज़ार की नींव बनती जा रही है। दूल्हे की डिग्री, नौकरी, वेतन और सामाजिक हैसियत के आधार पर उसका “रेट” तय किया जाता है। आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर और उच्च पदों पर कार्यरत युवकों के लिए दहेज की रकम और भव्य आयोजनों की अपेक्षाएँ भी उतनी ही बढ़ जाती हैं। मानो विवाह कोई पवित्र संबंध नहीं, बल्कि एक आर्थिक सौदा हो।

आज शहरी समाज में दहेज को सीधे-सीधे दहेज नहीं कहा जाता। महंगी गाड़ियाँ, आलीशान होटलों में शादियाँ, विदेशी हनीमून पैकेज, ब्रांडेड उपहार और लाखों रुपये का खर्च सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बना दिए गए हैं। कई बार लड़के पक्ष द्वारा बिना कुछ कहे ही ऐसा वातावरण बना दिया जाता है कि लड़की के माता-पिता अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करने को मजबूर हो जाते हैं।

यह मानसिक दबाव दहेज का ही आधुनिक और अधिक खतरनाक रूप है। दुखद यह भी है कि कई परिवार यह भ्रम पाल लेते हैं कि अधिक खर्च और महंगे उपहार उनकी बेटी को ससुराल में सम्मान और सुरक्षा दिला देंगे, जबकि अक्सर इसका उल्टा होता है। अपेक्षाएँ लगातार बढ़ती जाती हैं और उनके पूरा न होने पर प्रताड़ना शुरू हो जाती है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि शिक्षित मध्यम वर्ग, जो स्वयं को जागरूक और प्रगतिशील मानता है, वही इस दिखावे और प्रतिस्पर्धा की दौड़ में सबसे अधिक फँसता जा रहा है। शादी अब संस्कार कम और सामाजिक प्रदर्शन अधिक बनती जा रही है। परिणामस्वरूप अनेक परिवार कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं, लेकिन फिर भी इसे “सम्मान” का प्रश्न मानकर चुप रहते हैं।

दरअसल, जब कोई शिक्षित परिवार दहेज स्वीकार करता है, तो वह अनजाने में यह स्वीकार कर लेता है कि उसके बेटे के संस्कार, व्यक्तित्व और मानवीय मूल्य धन-दौलत से कमतर हैं। यह सोच स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के बजाय “आर्थिक बोझ” या “निवेश” के रूप में प्रस्तुत करती है। यही मानसिकता दहेज प्रथा को जीवित रखती है।

कानून अपनी जगह मौजूद हैं, लेकिन केवल कानूनी प्रावधान इस समस्या का समाधान नहीं कर सकते। जब तक समाज स्वयं दहेज को “रीति-रिवाज” या “प्रतिष्ठा” मानना बंद नहीं करेगा, तब तक बेटियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकती। आवश्यकता इस बात की है कि युवा पीढ़ी स्वयं आगे आकर यह संकल्प ले कि उनकी शिक्षा बिकाऊ नहीं है और विवाह किसी आर्थिक लेन-देन का माध्यम नहीं बनेगा।

आज सबसे अधिक आवश्यकता “शून्य दहेज” और “सादगीपूर्ण विवाह” को सामाजिक सम्मान देने की है। असली शिक्षा वही है, जो व्यक्ति को इंसान की “कीमत” नहीं, बल्कि उसकी “वैल्यू” समझना सिखाए। जब तक समाज सम्मान को धन और दिखावे से जोड़कर देखता रहेगा, तब तक दहेज केवल अपना नाम बदलकर हमारे बीच जीवित रहेगा और समाज को भीतर ही भीतर खोखला करता रहेगा।

भोपाल की मॉडल ट्विशा शर्मा जैसी चर्चित घटनाएँ केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं हैं, बल्कि वे उस सामाजिक मानसिकता का आईना हैं, जो आज भी बेटियों को समान अधिकार और सम्मान देने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हो पाई है।

दहेज केवल एक कुरीति नहीं, बल्कि महिलाओं के जीवन, सम्मान और स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा है। कानून से अधिक आवश्यकता सामाजिक चेतना और मानसिक परिवर्तन की है। जिस दिन समाज विवाह को प्रदर्शन नहीं, बल्कि समानता और सम्मान का संबंध मानने लगेगा, उसी दिन दहेज जैसी अमानवीय प्रथा वास्तव में समाप्त होगी।

स्त्रीधारा में प्रकाशित