Thursday, 20 August 2026

रक्षाबंधन पर निखारें अपनी खूबसूरती

प्रसिद्ध सौंदर्य विशेषज्ञ शहनाज हुसैन के आसान और असरदार ब्यूटी व केयर टिप्स 


रक्षाबंधन का त्योहार इस बार 28 अगस्त को मनाया जाएगा। सावन पूर्णिमा 27 अगस्त की सुबह 9:08 बजे शुरू होकर 28 अगस्त की सुबह 9:48 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार राखी का पर्व 28 अगस्त को मनाया जाएगा।

भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का यह त्योहार बरसात के उमस भरे मौसम में आता है। ऐसे में बहनें पारंपरिक परिधान के साथ आकर्षक और ताजगी भरा रूप चाहती हैं। सौंदर्य विशेषज्ञ शहनाज हुसैन के अनुसार त्योहार से करीब एक सप्ताह पहले त्वचा और बालों की देखभाल शुरू कर देनी चाहिए।

त्वचा की देखभाल

चेहरे पर कुछ भी लगाने से पहले त्वचा को अच्छी तरह साफ करें। अपनी त्वचा के अनुरूप माइल्ड फेसवॉश का इस्तेमाल करें और चेहरे को जोर से रगड़ने से बचें। यदि त्वचा को स्क्रब सूट करता है, तो त्योहार से एक-दो दिन पहले हल्का एक्सफोलिएशन किया जा सकता है। संवेदनशील त्वचा पर स्क्रब से बचना बेहतर है।

ताजगी के लिए तरबूज के रस का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे चेहरे पर लगभग 20 मिनट लगाकर साफ पानी से धो लें। फलों का मास्क बनाने के लिए केला, सेब, पपीता और संतरे का मिश्रण भी लगाया जा सकता है।

खीरे के रस में थोड़ा पाउडर दूध और अंडे का सफेद भाग मिलाकर बनाया गया मास्क भी चेहरे और गर्दन पर लगाया जा सकता है। तैलीय त्वचा के लिए मुल्तानी मिट्टी और गुलाबजल का हल्का पेस्ट उपयोगी हो सकता है।

आंखों की थकान दूर करने के लिए गुलाबजल में भिगोए कॉटन पैड कुछ देर बंद पलकों पर रखकर आराम किया जा सकता है। इस्तेमाल किए गए ठंडे टी-बैग भी इसी तरह लगाए जा सकते हैं।

बालों को दें चमक

बरसात में बाल अक्सर रूखे और उलझे हो जाते हैं। क्रीमी हेयर कंडीशनर में थोड़ा पानी मिलाकर हल्का स्प्रे तैयार किया जा सकता है। इसे बालों पर लगाकर कंघी करें और करीब एक घंटे बाद बाल धो लें।

रक्षाबंधन पर चोटी, हल्के कर्ल, आकर्षक हेयर क्लिप, रिबन या फूलों से बालों को सजाया जा सकता है। पारंपरिक चोटी लगभग हर चेहरे पर अच्छी लगती है। चेहरे के आकार के अनुसार चोटी की लंबाई और शैली चुनी जा सकती है।

दिन के समय रखें मेकअप हल्का

रक्षाबंधन दिन में मनाया जाता है, इसलिए मेकअप हल्का और सहज रखना बेहतर है। साफ त्वचा पर मॉइस्चराइजर और सनस्क्रीन लगाने के बाद हल्का पाउडर इस्तेमाल किया जा सकता है। तैलीय त्वचा के लिए मैटिफाइंग या ऑयल-कंट्रोल उत्पाद उपयोग किए जा सकते हैं।

आंखों के लिए आई पेंसिल, हल्का भूरा या स्लेटी आईशैडो और मस्कारा पर्याप्त है। होंठों पर हल्का गुलाबी, बैंगनी, भूरा, कांस्य या तांबे जैसे सौम्य रंग अच्छे लग सकते हैं। बहुत गहरे या अत्यधिक चमकीले रंगों से दिन के मेकअप में बचना बेहतर है।


परिधान और रंग

रक्षाबंधन के लिए रॉयल ब्लू, लाल, गुलाबी और मैरून जैसे चटकीले रंग आकर्षक विकल्प हो सकते हैं। मौसम को ध्यान में रखते हुए आरामदायक कपड़े और हल्का, टिकाऊ मेकअप त्योहार के दौरान बेहतर अनुभव देता है।

(शहनाज हुसैन अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सौंदर्य विशेषज्ञ हैं और ‘हर्बल क्वीन’ के नाम से लोकप्रिय हैं।)

Monday, 17 August 2026

प्रकृति, आस्था और परंपरा का पावन संगम: माँ मनसा पूजा


- सुजाता साहा


भारतीय लोक-संस्कृति और सनातन परंपरा में देवी-देवताओं की आराधना केवल अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, पर्यावरण और जन-जीवन के साथ गहरे जुड़ाव का प्रतीक है। इसी समृद्ध परंपरा में 'माँ मनसा' की पूजा का अत्यंत विशेष स्थान है। माँ मनसा को न केवल नागों की देवी माना जाता है, बल्कि वे भयमुक्ति, शक्ति, समृद्धि, और पारिवारिक मंगल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजी जाती हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ मनसा भगवान शिव की मानस पुत्री, नागराज वासुकी की बहन और महर्षि जरत्कारु की पत्नी हैं। 'मनसा' शब्द का शाब्दिक अर्थ मन की इच्छा और संकल्प से जुड़ा है। मान्यता है कि जो भक्त निश्छल मन और पवित्र भाव से माँ की शरण में आता है, देवी उसकी मनोकामना पूर्ण कर जीवन से हर प्रकार के संकट और भय का निवारण करती हैं।

विशेषकर श्रावण मास और नागपंचमी के अवसर पर माँ मनसा की आराधना का वातावरण चारों ओर भक्तिमय हो जाता है। पारिवारिक कल्याण: भक्तजन अपने परिवार के आरोग्य, संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखते हैं। श्रद्धा का भाव: यदि घर में माँ की प्रतिमा न भी हो, तो शिव मंदिर में शिवलिंग और नागदेव के समक्ष अर्पित किया गया धूप, दीप, फल और पुष्प भी माँ मनसा स्वीकार करती हैं। यहाँ माध्यम से अधिक भक्त के भाव की प्रधानता होती है।

लोक साहित्य और स्मृतियाँ: बंगाल, असम और मध्य भारत के विशाल भूभाग में 'मनसा मंगल' काव्य और लोकगीत युगों से गाए जाते रहे हैं। ये लोकगीत हमारी पीढ़ियों की जीवंत सांस्कृतिक धरोहर हैं।

माँ मनसा पूजा का सबसे व्यावहारिक और प्रासंगिक संदेश प्रकृति और जीवों के प्रति करुणा है। नागों और विषैले जीवों के प्रति भय को दूर कर उनके संरक्षण की भावना जगाना इस पूजा का मूल दर्शन है। यह पूजा हमें सिखाती है कि प्रकृति का हर छोटा-बड़ा जीव इस सृष्टि के संतुलन के लिए आवश्यक है, और उनके प्रति सम्मान रखना ही सच्ची आस्था है।

माँ मनसा की पूजा हमारे संस्कारों, लोक-आस्था और सांस्कृतिक चेतना का वह अटूट सूत्र है जो हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। माँ का आशीर्वाद समस्त जन-मानस पर सदैव बना रहे।

Saturday, 1 August 2026

इंसानियत से बड़ा कोई समाज नहीं

 

- सुजाता साहा


किसी भी समाज की पहचान उसकी परंपराओं से कम और उसकी संवेदनाओं से अधिक होती है। परंपराएं समय के साथ बदलती रहती हैं, लेकिन मानवता का मूल्य कभी नहीं बदलता। जब किसी समाज में इंसान से अधिक उसकी जाति, धर्म और सामाजिक पहचान को महत्व मिलने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि वहां रिश्ते नहीं, केवल रूढ़ियां बची हैं।

अंबिकापुर के शंकरनगर की एक घटना ने पूरे समाज के विवेक को झकझोर दिया है। 75 वर्षीय सावित्री बाई की मृत्यु के बाद उनकी अंतिम यात्रा में न परिवार साथ आया, न समाज। वर्षों पहले उन्होंने अपनी इच्छा से दूसरे समाज के व्यक्ति से प्रेम विवाह किया था। उसी निर्णय की सजा उन्हें जीवनभर सामाजिक बहिष्कार के रूप में मिली और मृत्यु के बाद भी उनका अपराध माफ नहीं किया गया।

यह केवल एक महिला की कहानी नहीं है। यह उस मानसिकता की कहानी है, जो आज भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं कर पाई है। हम संविधान में समानता की बात करते हैं, आधुनिकता का दावा करते हैं, लेकिन जब बात सामाजिक व्यवहार की आती है, तब हमारी सोच सदियों पीछे चली जाती है।

सबसे अधिक पीड़ा इस बात की है कि मृत्यु के बाद भी समाज का हृदय नहीं पिघला। जिस भारतीय संस्कृति में अंतिम संस्कार को सबसे बड़ा मानवीय और धार्मिक कर्तव्य माना गया है, उसी समाज ने एक मृत महिला को सम्मानजनक विदाई देने से भी इनकार कर दिया। क्या किसी व्यक्ति का अंतिम सम्मान भी उसके सामाजिक निर्णयों का बंधक होना चाहिए? यदि उत्तर "हाँ" है, तो हमें अपने समाज को सभ्य कहने का अधिकार नहीं है।

यह भी विडंबना है कि महिला का पति अपनी जीवनसंगिनी का अंतिम संस्कार करना चाहता था, लेकिन सामाजिक दबाव के आगे उसकी इच्छा भी दबा दी गई। यह दृश्य केवल एक परिवार की विवशता नहीं, बल्कि उस सामाजिक भय का प्रतीक है, जो आज भी इंसान को इंसान होने से रोक देता है।

ऐसे कठिन समय में अंबिकापुर की महापौर मंजूषा भगत ने जो किया, वह राजनीति नहीं, बल्कि मानवता का धर्म था। उन्होंने आगे बढ़कर अंतिम संस्कार कराया और यह संदेश दिया कि जनप्रतिनिधि होने का अर्थ केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में इंसान के साथ खड़ा होना भी है। उनका यह कदम बताता है कि संवेदनशीलता आज भी जीवित है, बस उसे आगे आने का साहस चाहिए।

समाज का उद्देश्य व्यक्ति को दंडित करना नहीं, बल्कि उसे स्वीकार करना और उसके साथ खड़ा होना है। यदि समाज किसी व्यक्ति की अंतिम यात्रा में भी उसका साथ छोड़ दे, तो फिर ऐसे समाज के होने या न होने में क्या अंतर रह जाता है? रिश्तों की असली परीक्षा सुख में नहीं, दुख और मृत्यु के क्षणों में होती है। जो समाज उस परीक्षा में असफल हो जाए, उसे आत्ममंथन की आवश्यकता है।

आज आवश्यकता कानून बदलने की नहीं, बल्कि सोच बदलने की है। प्रेम विवाह कोई अपराध नहीं है और न ही किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद उसके सम्मान को छीन सकती है। यदि हम सचमुच आधुनिक भारत का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें जाति, धर्म और सामाजिक अहंकार से ऊपर उठकर इंसानियत को सर्वोच्च स्थान देना होगा।

सावित्री बाई अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी अंतिम यात्रा समाज के लिए एक अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गई है, क्या हम सचमुच इंसानियत वाले समाज में जी रहे हैं, या केवल सामाजिक दिखावे के बीच मानवता को खो चुके हैं?

जिस दिन इस प्रश्न का उत्तर ईमानदारी से खोज लिया जाएगा, उसी दिन शायद किसी सावित्री बाई को प्रेम करने की सजा जीवनभर और मृत्यु के बाद तक नहीं भुगतनी पड़ेगी।