Saturday, 1 August 2026

इंसानियत से बड़ा कोई समाज नहीं

 

- सुजाता साहा


किसी भी समाज की पहचान उसकी परंपराओं से कम और उसकी संवेदनाओं से अधिक होती है। परंपराएं समय के साथ बदलती रहती हैं, लेकिन मानवता का मूल्य कभी नहीं बदलता। जब किसी समाज में इंसान से अधिक उसकी जाति, धर्म और सामाजिक पहचान को महत्व मिलने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि वहां रिश्ते नहीं, केवल रूढ़ियां बची हैं।

अंबिकापुर के शंकरनगर की एक घटना ने पूरे समाज के विवेक को झकझोर दिया है। 75 वर्षीय सावित्री बाई की मृत्यु के बाद उनकी अंतिम यात्रा में न परिवार साथ आया, न समाज। वर्षों पहले उन्होंने अपनी इच्छा से दूसरे समाज के व्यक्ति से प्रेम विवाह किया था। उसी निर्णय की सजा उन्हें जीवनभर सामाजिक बहिष्कार के रूप में मिली और मृत्यु के बाद भी उनका अपराध माफ नहीं किया गया।

यह केवल एक महिला की कहानी नहीं है। यह उस मानसिकता की कहानी है, जो आज भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं कर पाई है। हम संविधान में समानता की बात करते हैं, आधुनिकता का दावा करते हैं, लेकिन जब बात सामाजिक व्यवहार की आती है, तब हमारी सोच सदियों पीछे चली जाती है।

सबसे अधिक पीड़ा इस बात की है कि मृत्यु के बाद भी समाज का हृदय नहीं पिघला। जिस भारतीय संस्कृति में अंतिम संस्कार को सबसे बड़ा मानवीय और धार्मिक कर्तव्य माना गया है, उसी समाज ने एक मृत महिला को सम्मानजनक विदाई देने से भी इनकार कर दिया। क्या किसी व्यक्ति का अंतिम सम्मान भी उसके सामाजिक निर्णयों का बंधक होना चाहिए? यदि उत्तर "हाँ" है, तो हमें अपने समाज को सभ्य कहने का अधिकार नहीं है।

यह भी विडंबना है कि महिला का पति अपनी जीवनसंगिनी का अंतिम संस्कार करना चाहता था, लेकिन सामाजिक दबाव के आगे उसकी इच्छा भी दबा दी गई। यह दृश्य केवल एक परिवार की विवशता नहीं, बल्कि उस सामाजिक भय का प्रतीक है, जो आज भी इंसान को इंसान होने से रोक देता है।

ऐसे कठिन समय में अंबिकापुर की महापौर मंजूषा भगत ने जो किया, वह राजनीति नहीं, बल्कि मानवता का धर्म था। उन्होंने आगे बढ़कर अंतिम संस्कार कराया और यह संदेश दिया कि जनप्रतिनिधि होने का अर्थ केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में इंसान के साथ खड़ा होना भी है। उनका यह कदम बताता है कि संवेदनशीलता आज भी जीवित है, बस उसे आगे आने का साहस चाहिए।

समाज का उद्देश्य व्यक्ति को दंडित करना नहीं, बल्कि उसे स्वीकार करना और उसके साथ खड़ा होना है। यदि समाज किसी व्यक्ति की अंतिम यात्रा में भी उसका साथ छोड़ दे, तो फिर ऐसे समाज के होने या न होने में क्या अंतर रह जाता है? रिश्तों की असली परीक्षा सुख में नहीं, दुख और मृत्यु के क्षणों में होती है। जो समाज उस परीक्षा में असफल हो जाए, उसे आत्ममंथन की आवश्यकता है।

आज आवश्यकता कानून बदलने की नहीं, बल्कि सोच बदलने की है। प्रेम विवाह कोई अपराध नहीं है और न ही किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद उसके सम्मान को छीन सकती है। यदि हम सचमुच आधुनिक भारत का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें जाति, धर्म और सामाजिक अहंकार से ऊपर उठकर इंसानियत को सर्वोच्च स्थान देना होगा।

सावित्री बाई अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी अंतिम यात्रा समाज के लिए एक अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गई है, क्या हम सचमुच इंसानियत वाले समाज में जी रहे हैं, या केवल सामाजिक दिखावे के बीच मानवता को खो चुके हैं?

जिस दिन इस प्रश्न का उत्तर ईमानदारी से खोज लिया जाएगा, उसी दिन शायद किसी सावित्री बाई को प्रेम करने की सजा जीवनभर और मृत्यु के बाद तक नहीं भुगतनी पड़ेगी।

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