- सुजाता साहा
भारतीय लोक-संस्कृति और सनातन परंपरा में देवी-देवताओं की आराधना केवल अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, पर्यावरण और जन-जीवन के साथ गहरे जुड़ाव का प्रतीक है। इसी समृद्ध परंपरा में 'माँ मनसा' की पूजा का अत्यंत विशेष स्थान है। माँ मनसा को न केवल नागों की देवी माना जाता है, बल्कि वे भयमुक्ति, शक्ति, समृद्धि, और पारिवारिक मंगल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजी जाती हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ मनसा भगवान शिव की मानस पुत्री, नागराज वासुकी की बहन और महर्षि जरत्कारु की पत्नी हैं। 'मनसा' शब्द का शाब्दिक अर्थ मन की इच्छा और संकल्प से जुड़ा है। मान्यता है कि जो भक्त निश्छल मन और पवित्र भाव से माँ की शरण में आता है, देवी उसकी मनोकामना पूर्ण कर जीवन से हर प्रकार के संकट और भय का निवारण करती हैं।
विशेषकर श्रावण मास और नागपंचमी के अवसर पर माँ मनसा की आराधना का वातावरण चारों ओर भक्तिमय हो जाता है। पारिवारिक कल्याण: भक्तजन अपने परिवार के आरोग्य, संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखते हैं। श्रद्धा का भाव: यदि घर में माँ की प्रतिमा न भी हो, तो शिव मंदिर में शिवलिंग और नागदेव के समक्ष अर्पित किया गया धूप, दीप, फल और पुष्प भी माँ मनसा स्वीकार करती हैं। यहाँ माध्यम से अधिक भक्त के भाव की प्रधानता होती है।
लोक साहित्य और स्मृतियाँ: बंगाल, असम और मध्य भारत के विशाल भूभाग में 'मनसा मंगल' काव्य और लोकगीत युगों से गाए जाते रहे हैं। ये लोकगीत हमारी पीढ़ियों की जीवंत सांस्कृतिक धरोहर हैं।
माँ मनसा पूजा का सबसे व्यावहारिक और प्रासंगिक संदेश प्रकृति और जीवों के प्रति करुणा है। नागों और विषैले जीवों के प्रति भय को दूर कर उनके संरक्षण की भावना जगाना इस पूजा का मूल दर्शन है। यह पूजा हमें सिखाती है कि प्रकृति का हर छोटा-बड़ा जीव इस सृष्टि के संतुलन के लिए आवश्यक है, और उनके प्रति सम्मान रखना ही सच्ची आस्था है।
माँ मनसा की पूजा हमारे संस्कारों, लोक-आस्था और सांस्कृतिक चेतना का वह अटूट सूत्र है जो हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। माँ का आशीर्वाद समस्त जन-मानस पर सदैव बना रहे।

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