भारत में घटती जनसंख्या संतुलन की नई चुनौती
भारत लंबे समय तक जनसंख्या विस्फोट की चिंता से जूझता रहा है, लेकिन अब देश एक नए जनसांख्यिकीय मोड़ पर खड़ा है। दशकों तक जहां बढ़ती आबादी को विकास की सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था, वहीं आज जन्मदर और कुल प्रजनन दर में लगातार गिरावट नीति-निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों के लिए नई चिंता का विषय बनती जा रही है। यह परिवर्तन सामाजिक प्रगति का संकेत भी है और भविष्य की चुनौतियों की चेतावनी भी।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण तथा सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर घटकर लगभग 1.9 पर पहुंच गई है, जबकि जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए 2.1 की प्रजनन दर आवश्यक मानी जाती है। इसका अर्थ है कि भारत पहली बार प्रतिस्थापन स्तर ( रिप्लेसमेंट लेवल) से नीचे पहुंच चुका है। 1980 के दशक में भारत की प्रजनन दर 4.5 से अधिक थी, जो आज आधे से भी कम रह गई है। शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार और परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता इस परिवर्तन के प्रमुख कारण हैं।
भारत में जन्मदर और मृत्युदर दोनों में लगातार कमी आई है। वर्ष 1960 में जहां जन्म दर प्रति हजार आबादी पर लगभग 43 थी, वहीं आज यह घटकर लगभग 16 रह गई है। मृत्युदर भी 22 प्रति हजार से घटकर लगभग 6.5 प्रति हजार पर पहुंच गई है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि भारत जनसांख्यिकीय संक्रमण के अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है।
हालांकि भारत की स्थिति अभी भी दक्षिण कोरिया, जापान, चीन और इटली जैसे देशों से बेहतर है, लेकिन संकेत चिंताजनक हैं। दक्षिण कोरिया की प्रजनन दर 0.7, चीन की लगभग 1.0 तथा जापान और इटली की 1.2 के आसपास है। इन देशों के अनुभव बताते हैं कि अत्यधिक कम जन्मदर किसी भी राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक ढांचे को गहरे स्तर पर प्रभावित कर सकती है।
टेस्ला और स्पेस एक्स के प्रमुख एलन मस्क कई बार सार्वजनिक मंचों पर चेतावनी दे चुके हैं कि भविष्य में मानव सभ्यता के सामने सबसे बड़ा संकट जनसंख्या विस्फोट नहीं, बल्कि जनसंख्या में अत्यधिक गिरावट हो सकती है। उनके अनुसार यदि जन्म दर लंबे समय तक प्रतिस्थापन स्तर से नीचे बनी रहती है तो कई देशों की अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ सकती है और सामाजिक संरचना असंतुलित हो सकती है। भले ही सभी विशेषज्ञ उनकी राय से पूरी तरह सहमत न हों, लेकिन दुनिया के अनेक देशों का अनुभव इस चिंता को पूरी तरह खारिज भी नहीं करता।
जापान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या कुल आबादी के लगभग एक-तिहाई तक पहुंच चुकी है। श्रमिकों की कमी के कारण उद्योग प्रभावित हो रहे हैं और सरकार को पेंशन तथा स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी खर्च करना पड़ रहा है। दक्षिण कोरिया में कम जन्मदर के कारण कई स्कूल बंद होने की स्थिति में पहुंच गए हैं। चीन दशकों तक लागू एक-बच्चा नीति के दुष्परिणामों से जूझ रहा है, जहां कार्यशील आयु वर्ग की आबादी घट रही है और वृद्ध जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। इटली और यूरोप के कई देशों में गांव खाली हो रहे हैं, स्कूल बंद हो रहे हैं और श्रमिकों की कमी को पूरा करने के लिए प्रवासियों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।
भारत में जन्म दर में गिरावट के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में वृद्धि, विवाह की बढ़ती आयु, शहरीकरण, बच्चों के पालन-पोषण की बढ़ती लागत, परिवार नियोजन की उपलब्धता तथा करियर को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति इसके प्रमुख कारण हैं। आर्थिक असुरक्षा और रोजगार संबंधी चिंताएं भी युवा दंपतियों को छोटे परिवार की ओर प्रेरित कर रही हैं।
लेकिन घटती जन्मदर को केवल संकट के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इसके सकारात्मक पक्ष भी हैं। छोटे परिवारों में बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक निवेश संभव होता है। महिलाओं को करियर के बेहतर अवसर मिलते हैं। संसाधनों पर दबाव कम होता है और प्रति व्यक्ति आय बढ़ने की संभावना रहती है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ इसे सामाजिक विकास का स्वाभाविक परिणाम मानते हैं।
चुनौती तब उत्पन्न होती है जब जन्मदर लंबे समय तक बहुत नीचे बनी रहती है। ऐसी स्थिति में कार्यशील आयु वर्ग की आबादी घटने लगती है, जबकि बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ती है। इससे पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर भारी दबाव पड़ता है। उद्योगों को श्रमिकों की कमी का सामना करना पड़ता है और आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक भारत में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या 30 करोड़ से अधिक हो सकती है।
फिलहाल भारत के सामने तत्काल संकट नहीं है। देश के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है और औसत आयु लगभग 29 वर्ष है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन यदि अगले दो से तीन दशकों तक प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे बनी रहती है, तो भारत को भी जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
इसलिए आवश्यकता किसी अतिवादी जनसंख्या नीति की नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण की है। सरकार को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं, मातृत्व-पितृत्व अवकाश, सस्ती बाल देखभाल सेवाओं और युवा परिवारों के लिए आवास सहायता जैसी नीतियों पर ध्यान देना होगा। साथ ही वृद्धजन कल्याण और सामाजिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत बनाना होगा। दूसरी ओर समाज को महिलाओं के करियर और परिवार दोनों का सम्मान करने वाली सोच विकसित करनी होगी तथा बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी में पुरुषों की समान भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।
भारत आज जनसंख्या विस्फोट नहीं, बल्कि जनसंख्या संतुलन की चुनौती का सामना कर रहा है। घटती जन्मदर सामाजिक प्रगति का प्रमाण है, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह स्थिति न तो पूर्ण संकट है और न ही केवल अवसर। यह एक चेतावनी भी है और अवसर भी। यदि भारत समय रहते अपनी युवा शक्ति को कौशल, रोजगार, उत्पादकता और नवाचार से जोड़ने में सफल होता है, तो वह जनसांख्यिकीय परिवर्तन को विकास की नई ऊर्जा में बदल सकता है। अन्यथा आने वाले दशकों में वही समस्या भारत के सामने खड़ी हो सकती है, जिससे आज दुनिया के कई विकसित देश जूझ रहे हैं। जनसंख्या का संतुलन ही किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति है, और भारत को इसी संतुलन को बनाए रखने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
@SUJATASAHA



























