Wednesday, 24 June 2026

क्या भारत बूढ़ा हो रहा है?

 भारत में घटती जनसंख्या संतुलन की नई चुनौती

- सुजाता साहा

भारत लंबे समय तक जनसंख्या विस्फोट की चिंता से जूझता रहा है, लेकिन अब देश एक नए जनसांख्यिकीय मोड़ पर खड़ा है। दशकों तक जहां बढ़ती आबादी को विकास की सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था, वहीं आज जन्मदर और कुल प्रजनन दर में लगातार गिरावट नीति-निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों के लिए नई चिंता का विषय बनती जा रही है। यह परिवर्तन सामाजिक प्रगति का संकेत भी है और भविष्य की चुनौतियों की चेतावनी भी।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण तथा सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर घटकर लगभग 1.9 पर पहुंच गई है, जबकि जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए 2.1 की प्रजनन दर आवश्यक मानी जाती है। इसका अर्थ है कि भारत पहली बार प्रतिस्थापन स्तर ( रिप्लेसमेंट लेवल) से नीचे पहुंच चुका है। 1980 के दशक में भारत की प्रजनन दर 4.5 से अधिक थी, जो आज आधे से भी कम रह गई है। शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार और परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता इस परिवर्तन के प्रमुख कारण हैं।

भारत में जन्मदर और मृत्युदर दोनों में लगातार कमी आई है। वर्ष 1960 में जहां जन्म दर प्रति हजार आबादी पर लगभग 43 थी, वहीं आज यह घटकर लगभग 16 रह गई है। मृत्युदर भी 22 प्रति हजार से घटकर लगभग 6.5 प्रति हजार पर पहुंच गई है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि भारत जनसांख्यिकीय संक्रमण के अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है।

हालांकि भारत की स्थिति अभी भी दक्षिण कोरिया, जापान, चीन और इटली जैसे देशों से बेहतर है, लेकिन संकेत चिंताजनक हैं। दक्षिण कोरिया की प्रजनन दर 0.7, चीन की लगभग 1.0 तथा जापान और इटली की 1.2 के आसपास है। इन देशों के अनुभव बताते हैं कि अत्यधिक कम जन्मदर किसी भी राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक ढांचे को गहरे स्तर पर प्रभावित कर सकती है।

टेस्ला और स्पेस एक्स के प्रमुख एलन मस्क कई बार सार्वजनिक मंचों पर चेतावनी दे चुके हैं कि भविष्य में मानव सभ्यता के सामने सबसे बड़ा संकट जनसंख्या विस्फोट नहीं, बल्कि जनसंख्या में अत्यधिक गिरावट हो सकती है। उनके अनुसार यदि जन्म दर लंबे समय तक प्रतिस्थापन स्तर से नीचे बनी रहती है तो कई देशों की अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ सकती है और सामाजिक संरचना असंतुलित हो सकती है। भले ही सभी विशेषज्ञ उनकी राय से पूरी तरह सहमत न हों, लेकिन दुनिया के अनेक देशों का अनुभव इस चिंता को पूरी तरह खारिज भी नहीं करता।


जापान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या कुल आबादी के लगभग एक-तिहाई तक पहुंच चुकी है। श्रमिकों की कमी के कारण उद्योग प्रभावित हो रहे हैं और सरकार को पेंशन तथा स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी खर्च करना पड़ रहा है। दक्षिण कोरिया में कम जन्मदर के कारण कई स्कूल बंद होने की स्थिति में पहुंच गए हैं। चीन दशकों तक लागू एक-बच्चा नीति के दुष्परिणामों से जूझ रहा है, जहां कार्यशील आयु वर्ग की आबादी घट रही है और वृद्ध जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। इटली और यूरोप के कई देशों में गांव खाली हो रहे हैं, स्कूल बंद हो रहे हैं और श्रमिकों की कमी को पूरा करने के लिए प्रवासियों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।

भारत में जन्म दर में गिरावट के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में वृद्धि, विवाह की बढ़ती आयु, शहरीकरण, बच्चों के पालन-पोषण की बढ़ती लागत, परिवार नियोजन की उपलब्धता तथा करियर को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति इसके प्रमुख कारण हैं। आर्थिक असुरक्षा और रोजगार संबंधी चिंताएं भी युवा दंपतियों को छोटे परिवार की ओर प्रेरित कर रही हैं।

लेकिन घटती जन्मदर को केवल संकट के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इसके सकारात्मक पक्ष भी हैं। छोटे परिवारों में बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक निवेश संभव होता है। महिलाओं को करियर के बेहतर अवसर मिलते हैं। संसाधनों पर दबाव कम होता है और प्रति व्यक्ति आय बढ़ने की संभावना रहती है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ इसे सामाजिक विकास का स्वाभाविक परिणाम मानते हैं।

चुनौती तब उत्पन्न होती है जब जन्मदर लंबे समय तक बहुत नीचे बनी रहती है। ऐसी स्थिति में कार्यशील आयु वर्ग की आबादी घटने लगती है, जबकि बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ती है। इससे पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर भारी दबाव पड़ता है। उद्योगों को श्रमिकों की कमी का सामना करना पड़ता है और आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक भारत में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या 30 करोड़ से अधिक हो सकती है।

फिलहाल भारत के सामने तत्काल संकट नहीं है। देश के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है और औसत आयु लगभग 29 वर्ष है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन यदि अगले दो से तीन दशकों तक प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे बनी रहती है, तो भारत को भी जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

इसलिए आवश्यकता किसी अतिवादी जनसंख्या नीति की नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण की है। सरकार को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं, मातृत्व-पितृत्व अवकाश, सस्ती बाल देखभाल सेवाओं और युवा परिवारों के लिए आवास सहायता जैसी नीतियों पर ध्यान देना होगा। साथ ही वृद्धजन कल्याण और सामाजिक सुरक्षा तंत्र को मजबूत बनाना होगा। दूसरी ओर समाज को महिलाओं के करियर और परिवार दोनों का सम्मान करने वाली सोच विकसित करनी होगी तथा बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी में पुरुषों की समान भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।

भारत आज जनसंख्या विस्फोट नहीं, बल्कि जनसंख्या संतुलन की चुनौती का सामना कर रहा है। घटती जन्मदर सामाजिक प्रगति का प्रमाण है, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह स्थिति न तो पूर्ण संकट है और न ही केवल अवसर। यह एक चेतावनी भी है और अवसर भी। यदि भारत समय रहते अपनी युवा शक्ति को कौशल, रोजगार, उत्पादकता और नवाचार से जोड़ने में सफल होता है, तो वह जनसांख्यिकीय परिवर्तन को विकास की नई ऊर्जा में बदल सकता है। अन्यथा आने वाले दशकों में वही समस्या भारत के सामने खड़ी हो सकती है, जिससे आज दुनिया के कई विकसित देश जूझ रहे हैं। जनसंख्या का संतुलन ही किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति है, और भारत को इसी संतुलन को बनाए रखने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

@SUJATASAHA

TRUE SOLDIER में प्रकाशित मेरा लेखा


 

Wednesday, 17 June 2026

खमतराई रेलवे क्रॉसिंग : वर्षों से जाम की मार झेल रहे रहवासी, राहत का इंतजार

- सुजाता साहा

रायपुर-बिलासपुर मुख्य रेलवे मार्ग पर स्थित खमतराई रेलवे क्रॉसिंग राजधानी की सबसे गंभीर यातायात समस्याओं में से एक बन चुकी है। देश के प्रमुख रेल मार्गों में शामिल इस लाइन पर प्रतिदिन 100 से अधिक ट्रेनों का आवागमन होता है। परिणामस्वरूप फाटक बार-बार बंद रहता है और एक बार फाटक बंद होने के बाद कई बार 4 से 5 ट्रेनों के गुजरने तक लोगों को इंतजार करना पड़ता है।

स्थिति ऐसी है कि भीषण गर्मी, बारिश और कड़ाके की ठंड के बीच स्कूली बच्चे, मरीज, वाहन चालक और आम राहगीर 20 से 30 मिनट तक सड़क पर खड़े रहने को मजबूर हो जाते हैं। इससे न केवल समय की बर्बादी होती है, बल्कि आपातकालीन परिस्थितियों में लोगों को गंभीर परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है।

खमतराई, डब्ल्यूआरएस कॉलोनी, श्रीनगर, गुढ़ियारी, गोगांव और शिवानंद नगर सहित आसपास के क्षेत्रों की लगभग 65 हजार से अधिक आबादी इस मार्ग पर निर्भर है। क्षेत्र में स्कूल, अस्पताल, थोक बाजार और अनेक व्यावसायिक प्रतिष्ठान स्थित होने के कारण दिनभर यातायात का भारी दबाव बना रहता है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि वर्षों से लगने वाले जाम के कारण रोजाना समय और ईंधन दोनों की भारी बर्बादी हो रही है।

हाल ही में कचना रेलवे ओवरब्रिज के शुरू होने से उस क्षेत्र के लोगों को बड़ी राहत मिली है। इसके बाद अब खमतराई क्षेत्र के रहवासी भी लंबे समय से लंबित अंडरब्रिज अथवा ओवरब्रिज परियोजना को शीघ्र प्रारंभ करने की मांग कर रहे हैं।

खमतराई रेलवे क्रॉसिंग पर अंडरब्रिज निर्माण की परियोजना कई वर्षों से प्रस्तावित है, लेकिन अब तक धरातल पर नहीं उतर सकी है। हालांकि रेलवे जोन मुख्यालय द्वारा इसकी ड्राइंग एवं डिजाइन को मंजूरी प्रदान कर दी गई है। विभागीय सूत्रों के अनुसार आगामी एक माह में टेंडर प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है तथा वर्ष 2027 तक परियोजना पूर्ण करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

ज्ञात हो कि यह परियोजना नई नहीं है। वर्ष 2016-17 में इसे लगभग 6 करोड़ रुपये की लागत से स्वीकृति मिली थी, लेकिन वित्तीय और प्रशासनिक कारणों से कार्य प्रारंभ नहीं हो सका। लगभग एक दशक की देरी के कारण अब इसकी अनुमानित लागत बढ़कर 17 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गई है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस दौरान क्षेत्र की जनता लगातार परेशान होती रही, लेकिन समस्या के स्थायी समाधान के लिए न तो जनप्रतिनिधियों ने अपेक्षित पहल की और न ही किसी बड़े सामाजिक संगठन ने प्रभावी दबाव बनाया। इस अवधि में राज्य में दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों की सरकारें रहीं, फिर भी परियोजना फाइलों से बाहर नहीं निकल सकी।

परियोजना में हुई देरी का खामियाजा दोहरी तरह से जनता को भुगतना पड़ा है। एक ओर निर्माण लागत लगभग तीन गुना तक बढ़ गई, वहीं दूसरी ओर हजारों नागरिक वर्षों से जाम, समय की बर्बादी और असुविधा झेलने को मजबूर हैं। क्षेत्रवासियों को उम्मीद है कि जल्द ही निर्माण कार्य शुरू होगा और उन्हें इस पुरानी समस्या से स्थायी राहत मिलेगी।

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Saturday, 30 May 2026

रिश्तों को प्यार-विश्वास से सींचना जरूरी

रिश्तों को भी देखभाल की ज़रूरत होती है

सुजाता साहा 


रिश्तों को भी उसी तरह प्यार, समय और विश्वास से सींचना पड़ता है,

जैसे एक पौधे को बढ़ने के लिए हर रोज़ पानी और देखभाल की ज़रूरत होती है।

आप भी सोच रहे होंगे कि मैं भी कहां रिश्तों की तुलना एक पौधे से कर रही हूं लेकिन ये सच है। जिस तरह एक नन्हा सा बीज रातों-रात विशाल पेड़ नहीं बनता, उसी तरह कोई भी रिश्ता अचानक से गहरा नहीं होता। उसके लिए प्यार, समय , विश्वास,  धैर्य और देखभाल की ज़रूरत होती है। जैसे सूरज की रोशनी के बिना पौधा मुरझा जाता है, वैसे ही बिना प्यार और गर्माहट के रिश्ता बेजान हो जाता है। यह वह ऊर्जा है जो दो लोगों को जोड़े रखती है। हाथ की लकीरों से रिश्ते नहीं बनते, बल्कि उन हाथों से जब किसी का हाथ थामकर मुश्किलों में साथ चला जाता है, तब रिश्ता बनता है।

पौधे को रोज़ पानी चाहिए होता है, न कि महीने में एक बार बाल्टी भर के। रिश्तों में भी 'क्वालिटी टाइम' की निरंतरता मायने रखती है। बातचीत वह पानी है जो रिश्तों की जड़ों को सूखने नहीं देता। जब संवाद बंद हो जाता है, तो गलतफहमियों की परतें जमने लगती हैं। हम अक्सर बड़े मौकों (जैसे जन्मदिन या एनिवर्सरी) पर तो बहुत प्यार दिखाते हैं, लेकिन रोज़मर्रा की ज़िंदगी में छोटे-छोटे 'थैंक यू' या 'कैसे हो?' कहना भूल जाते हैं। जबकि रिश्ते इन्हीं छोटे पलों से सांस लेते हैं, साथ बिताए छोटे-छोटे पल ही जड़ों को मज़बूत करते हैं। मिट्टी जितनी उपजाऊ होगी, पौधा उतना ही स्वस्थ रहेगा। विश्वास वह आधार है जिस पर पूरा रिश्ता टिका होता है। अगर नींव में शक की दीमक लग जाए, तो बड़े से बड़ा रिश्ता ढह जाता है। अगर समय पर पुरानी कड़वाहटों को नहीं हटाया जाए, तो नई खुशियों के लिए जगह ही नहीं बचती। कभी-कभी पौधे की सूखी पत्तियों को काटना पड़ता है ताकि वह और बढ़ सके। वैसे ही, रिश्तों में माफ़ी और समझदारी की ज़रूरत होती है। गलतफहमियों को दूर करना और एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करना ही असली देखभाल है।

रिश्ते बनाना तो हुनर है, लेकिन रिश्तों को निभाना एक साधना है। जैसे माली को पता होता है कि किस मौसम में पौधे को कैसी ज़रूरत है, वैसे ही हमें भी रिश्तों के उतार-चढ़ाव में धैर्य रखना चाहिए।  रिश्तों की यह 'बागवानी' वाकई थका देने वाली हो सकती है, लेकिन जब वह पौधा फल और छाया देने लगता है, तो माली की सारी मेहनत सफल हो जाती है।

रिश्ता 'बनाना' सिर्फ एक शुरुआत है, उसे 'जीना' और 'सींचना' ही असली कला है।



Friday, 29 May 2026

दहेज : सभ्य समाज की असभ्य सच्चाई

आधुनिक समाज में दहेज की बदलती तस्वीर

 सुजाता साहा



12 मई 2026 को भोपाल की चर्चित मॉडल ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत ने पूरे समाज के सामने एक बार फिर वही पुराना, लेकिन बेहद गंभीर सवाल खड़ा कर दिया, आखिर कब तक बेटियाँ दहेज की भेंट चढ़ती रहेंगी?

इस घटना ने समाज के उस वर्ग को भी कठघरे में खड़ा कर दिया, जिसे शिक्षित, सभ्य और प्रगतिशील माना जाता है। विडंबना यह है कि समाज का निम्न और मध्यम वर्ग अक्सर इसी तथाकथित “सभ्य समाज” का अनुसरण करता है। ऐसे में यह प्रश्न और गंभीर हो जाता है कि क्या दहेज जैसी कुरीतियाँ अब केवल ग्रामीण या अशिक्षित समाज की समस्या रह गई हैं?

सच्चाई यह है कि आज दहेज का सबसे परिष्कृत और भयावह रूप शिक्षित तथा शहरी समाज में दिखाई देता है। दहेज ने अब अपना पारंपरिक स्वरूप बदल लिया है। इसे “प्रतिष्ठा”, “स्टेटस”, “शगुन”, “उपहार” और “बेटी को खुशी से दिया गया सामान” जैसे सभ्य शब्दों की आड़ में स्वीकार्यता दी जा रही है। आधुनिक समाज में दहेज अब खुलकर माँगी जाने वाली वस्तु नहीं, बल्कि सामाजिक दिखावे और आर्थिक लेन-देन का एक सुनियोजित माध्यम बन चुका है।

भारत में दहेज से जुड़ी मौतें आज भी एक गंभीर सामाजिक समस्या बनी हुई हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के हालिया आँकड़े इसकी भयावहता को स्पष्ट करते हैं —

वर्ष 2024 में भारत में दहेज से जुड़ी 5,737 महिलाओं की मौतें दर्ज की गईं। अर्थात औसतन हर 90 मिनट में एक महिला दहेज हिंसा का शिकार हुई। वर्ष 2023 में दहेज मृत्यु के 6,156 मामले दर्ज किए गए थे।

उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे अधिक प्रभावित राज्य रहा, जहाँ 2024 में 2,038 तथा 2023 में 2,122 मामले दर्ज हुए। बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड भी दहेज हिंसा से प्रभावित प्रमुख राज्यों में शामिल हैं।

विडंबना यह है कि जिस शिक्षा से संवेदनशीलता, समानता और सामाजिक चेतना की अपेक्षा की जाती थी, वही आज दहेज के नए बाज़ार की नींव बनती जा रही है। दूल्हे की डिग्री, नौकरी, वेतन और सामाजिक हैसियत के आधार पर उसका “रेट” तय किया जाता है। आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर और उच्च पदों पर कार्यरत युवकों के लिए दहेज की रकम और भव्य आयोजनों की अपेक्षाएँ भी उतनी ही बढ़ जाती हैं। मानो विवाह कोई पवित्र संबंध नहीं, बल्कि एक आर्थिक सौदा हो।

आज शहरी समाज में दहेज को सीधे-सीधे दहेज नहीं कहा जाता। महंगी गाड़ियाँ, आलीशान होटलों में शादियाँ, विदेशी हनीमून पैकेज, ब्रांडेड उपहार और लाखों रुपये का खर्च सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बना दिए गए हैं। कई बार लड़के पक्ष द्वारा बिना कुछ कहे ही ऐसा वातावरण बना दिया जाता है कि लड़की के माता-पिता अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करने को मजबूर हो जाते हैं।

यह मानसिक दबाव दहेज का ही आधुनिक और अधिक खतरनाक रूप है। दुखद यह भी है कि कई परिवार यह भ्रम पाल लेते हैं कि अधिक खर्च और महंगे उपहार उनकी बेटी को ससुराल में सम्मान और सुरक्षा दिला देंगे, जबकि अक्सर इसका उल्टा होता है। अपेक्षाएँ लगातार बढ़ती जाती हैं और उनके पूरा न होने पर प्रताड़ना शुरू हो जाती है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि शिक्षित मध्यम वर्ग, जो स्वयं को जागरूक और प्रगतिशील मानता है, वही इस दिखावे और प्रतिस्पर्धा की दौड़ में सबसे अधिक फँसता जा रहा है। शादी अब संस्कार कम और सामाजिक प्रदर्शन अधिक बनती जा रही है। परिणामस्वरूप अनेक परिवार कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं, लेकिन फिर भी इसे “सम्मान” का प्रश्न मानकर चुप रहते हैं।

दरअसल, जब कोई शिक्षित परिवार दहेज स्वीकार करता है, तो वह अनजाने में यह स्वीकार कर लेता है कि उसके बेटे के संस्कार, व्यक्तित्व और मानवीय मूल्य धन-दौलत से कमतर हैं। यह सोच स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के बजाय “आर्थिक बोझ” या “निवेश” के रूप में प्रस्तुत करती है। यही मानसिकता दहेज प्रथा को जीवित रखती है।

कानून अपनी जगह मौजूद हैं, लेकिन केवल कानूनी प्रावधान इस समस्या का समाधान नहीं कर सकते। जब तक समाज स्वयं दहेज को “रीति-रिवाज” या “प्रतिष्ठा” मानना बंद नहीं करेगा, तब तक बेटियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकती। आवश्यकता इस बात की है कि युवा पीढ़ी स्वयं आगे आकर यह संकल्प ले कि उनकी शिक्षा बिकाऊ नहीं है और विवाह किसी आर्थिक लेन-देन का माध्यम नहीं बनेगा।

आज सबसे अधिक आवश्यकता “शून्य दहेज” और “सादगीपूर्ण विवाह” को सामाजिक सम्मान देने की है। असली शिक्षा वही है, जो व्यक्ति को इंसान की “कीमत” नहीं, बल्कि उसकी “वैल्यू” समझना सिखाए। जब तक समाज सम्मान को धन और दिखावे से जोड़कर देखता रहेगा, तब तक दहेज केवल अपना नाम बदलकर हमारे बीच जीवित रहेगा और समाज को भीतर ही भीतर खोखला करता रहेगा।

भोपाल की मॉडल ट्विशा शर्मा जैसी चर्चित घटनाएँ केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं हैं, बल्कि वे उस सामाजिक मानसिकता का आईना हैं, जो आज भी बेटियों को समान अधिकार और सम्मान देने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हो पाई है।

दहेज केवल एक कुरीति नहीं, बल्कि महिलाओं के जीवन, सम्मान और स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा है। कानून से अधिक आवश्यकता सामाजिक चेतना और मानसिक परिवर्तन की है। जिस दिन समाज विवाह को प्रदर्शन नहीं, बल्कि समानता और सम्मान का संबंध मानने लगेगा, उसी दिन दहेज जैसी अमानवीय प्रथा वास्तव में समाप्त होगी।

स्त्रीधारा में प्रकाशित



Monday, 6 December 2021

नींद की समस्या, सोने से पहले करें ये 4 योगासन

 



आधुनिक युग में लोगों को लिए समय पर सोना और जगना मुश्किल हो गया है। अधिकतर लोगों की ये समस्या होती है कि दिनभर काम के बाद थके होने के बाद भी उन्हें रात में नींद नहीं आती और सोने में रोज रात को देर हो जाती है। लगभग युवाओं से लेकर बड़ी उम्र के लोगों के बीच ये समस्या आम हो गई है। नींद आपके शरीर के लिए बहुत जरूरी होती है। ऐसे में अगर आप एक अच्छी नींद नहीं लेते तो शरीर और मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। लोग नींद के लिए दवाएं तक खाते हैं। इस तरह की दवाओं से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। आपकी लाइफस्टाइल में टाइम टेबल बिगड़ने से नींद की समस्या हो सकती है। नींद की समस्या से अगर आप भी परेशान हैं और दिन भर के काम के बाद भी रात में सो नहीं पाते हैं तो योगासन करें। सोने से पहले मात्र 15 मिनट आप योगासन करके नींद की समस्या से छुटकारा पा सकते हैं। इससे आपके दिमाग के स्लीपिंग हार्मोन भी बढ़ जाते हैं। ये हैं अच्छी नींद के लिए रात में सोने से पहले किए जाने वाले योगासन।

बालासन

इस आसन से आपका दिमाग शांत होता है। इसे करने के लिए मैट पर वज्रासन पोज में बैठ जाएं। सांस को अंदर लेते हुए दोनों हाथों को सीधा सिर के ऊपर ले जाएं। अब सांस बाहर छोड़ते हुए आगे की ओर झुकें। इस दौरान हथेलियों और सिर को जमीन पर टिका लें। फिर सांस अंदर लेते और छोड़ते हुए उंगलियों को आपस में जोड़ते हुए सिर को दोनों हथेलियों के बीच में धीरे से रखें।
शवासन

इस आसन से आपकी तंत्रिका तंत्र शांत होती है और सभी थकी हुई मांसपेशियों व कंधों को आराम मिलता है। शवासन करने के लिए पीठ के बल लेटकर दोनों पैरों के बीच एक फीट की दूरी पर फैला लें। अब पैरों के पंजे की तरफ शरीर को ढीला छोड़ते हुए आराम से सांस लें और पूरा शरीर ढीला छोड़ दें।
उत्तानासन

अस आसन को नियमित करने से आपको जल्द नींद पर फर्क दिखने लगेगा। उत्तानासन करने के लिए सबसे पहले सीधे खड़े हो जाएं। दोनों हाथों को लंबी सांस लेते हुए ऊपर की ओर ले जाते हुए सांस छोड़ें और फिर हाथों को नीचे जमीन की ओर ले जाएं। इस दौरान पैरों के अंगूठे को छूने की कोशिश करें।
शलभासन

इस आसन को करने के लिए पेट के बल लेट कर दोनों हथेलियों को जांघों के नीचे रखें। अब दोनों पैर की एड़ियों को आपस में जोड़करपंजे को सीधे रखें। धीरे-धीरे पैरों को ऊपर उठाने की कोशिश करें। गहरी सांस लें इसी अवस्था में कुछ देर रहें।

हरी मटर अधिक मात्रा में खाना सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है, जानें क्या हैं इसके साइड इफेक्ट्स


हरी मटर में प्रोटीन, अमीनो एसिड और फाइबर की भरपूर मात्रा होती है. इसमें विटामिन डी भी होता है जो हड्डियों के लिए जरूरी है, लेकिन इसे बहुत ज्यादा मात्रा में खाने से कैल्शियम का लेवल कम होने लगता है और यूरिक एसिड बढ़ने लगता है. यूरिक एसिड बढ़ने से जोड़ों में दर्द की समस्या हो सकती है. अधिक मात्रा में मटर का सेवन हड्डियों को कमजोर करता है. गठिया की समस्या में भी हरी मटर खाना आपको नुकसान पहुंचाएगा.


मटर के ज्यादा सेवन से पेट में दर्द और सूजन की समस्या हो सकती है. इससे गैस की प्रॉब्लम हो सकती है. मटर में बहुत ज्यादा कार्बोहाइड्रेट होता है. ज्यादा मात्रा में मटर खाने से ये आसानी से नहीं पचता और मटर में मौजूद लेक्टिन पेट में सूजन को बढ़ाने का काम करता है. अधिक मात्रा में मटर के सेवन से डायरिया की समस्या भी हो सकती है.
हरी मटर खाने से बॉडी फैट बढ़ सकता है. ये प्रोटीन और फाइबर का बहुत अच्छा सोर्स है, लेकिन अधिक मात्रा में मटर का सेवन आपको नुकसान पहुंचाएगा.
ज्यादा मात्रा में मटर के सेवन से शरीर को पोषक तत्व नहीं मिलते. मटर में मौजूद फाइटिक एसिड और लेक्टिन पोषक तत्वों के अवशोषण में बाधा डालते हैं.

 सर्दियों के मौसम में हरी मटर का इस्तेमाल ज्यादातर व्यंजनों में किया जाता है. कुछ लोग इसे उबालकर भी खाते हैं. मटर का सेवन सेहत के लिए फायदेमंद है, लेकिन अधिक मात्रा में इसे खाना सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है. जानें क्या हैं इसके साइड इफेक्ट्स-

मटर में पाया जाने वाला विटामिन के शरीर में कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकता है. इसमें पाए जाने वाले पोषक तत्व हड्डियों को मजबूत बनाते हैं, लेकिन बहुत अधिक मात्रा में मटर का सेवन न करें. हरी मटर की ज्यादा मात्रा शरीर में विटामिन K का लेवल बढ़ा देती है. ये खून को पतला करता है और प्लेटलेट्स काउंट को कम कर देता है. इसकी वजह से घाव को भरने में ज्यादा समय लगता है. अगर आपको पेट से जुड़ी समस्या है तो भी मटर का सेवन नुकसान पहुंचाएगा.

Sunday, 5 December 2021

भारत की जनता से अपील

 


डॉ राजाराम त्रिपाठी

अब चाहे कोई इसे माने या ना माने पर यह अब एक ऐतिहासिक सत्य है कि,  इस किसान-आंदोलन को कुचलने की बहुस्तरीय हजारों कोशिशों और बदनाम करने के लाखों कुत्सित प्रयासों के बावजूद  वर्तमान किसान आंदोलन ने देश के ही नहीं बल्कि विश्व के हालिया सभी आंदोलनों के इतिहास में एक मील का पत्थर स्थापित किया है।

आज देश की वर्तमान स्थिति को हर नागरिक को गहराई से समझने बूझने की जरूरत है। अभी तक स्थिति यह थी कि देश में सभी अलग-अलग समूहों और स्थानों के लोग जो अपने जरूरी कारण के लिए सरकार से अलग-अलग लड़ रहे थे,पर किसी की भी बात नहीं सुनी गई और सरकार ने  अपने ही एजेंडे पर काम किया है। ऐसी स्थिति में पहली बार किसानों के एक साल के लंबे गांधीवादी संघर्ष ने भारत के लोकतंत्र की मज़बूत जड़ों की ताकत को एक बार फिर साबित किया है।

अब हम किसानों की भी  हमारे माननीय पीएम की भांति ही समूचे देश से अपील है कि कृपया इन्हें बताएं कि हम केवल किसानों का ही समूह नहीं है बल्कि आज किसान इस देश के सभी नागरिकों व संगठनों  के प्रतिनिधि हैं, चाहे वह बैंक हो, एएआई, एयरइंडिया , रेलकर्मी,बीमा कर्मी, शिक्षक, डॉक्टर, पूर्व सैनिक संघ, पेंशन वंचित वर्ग, असंख्य बेरोजगार युवा, असंगठित सेक्टर के मजदूर और हर कोई जो सरकार की कार्पोरेटपरस्त जनविरोधी नीतियों और कार्यक्रमों के कारण समस्या का सामना कर रहा है। किसान आंदोलन ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि मुद्दे सच्चे तथा जनता से जुड़े हुए हों तो एकजुट होकर शांतिपूर्ण तरीकों से इस तरह की परम अहंकारी सरकार को भी झुकाया जा सकता है और इसे लोकतंत्र के आइने में इनकी वास्तविक जनविरोधी राक्षसी शक्ल को देश को दिखाया जा सकता है।

इसलिए आज आईफा तथा हम सब साथी किसान संगठन, आप सभी समान विचारधारा वाले समस्त समूहों/समुदायों/ संगठनों/संघों से इस निर्णायक दौर में किसान आंदोलन को खुले मन से खुला समर्थन करने और इस आंदोलन को हर स्तर पर यथासंभव मजबूती प्रदान करने की अपील करते हैं। यह न केवल हमें अपनी अन्य लंबित देशहित के लिए जरूरी मांगों को हासिल करने में मदद करेगा, बल्कि आपकी लंबित समस्याओं के समुचित समाधान के लिए भी विजय द्वार खोलेगा।

   आज सरकार रणनीति के तहत देश के किसानों को खलनायक साबित करने की कोशिश कर रही है। इतना ही नहीं यह देश के अन्य वर्गों जैसे नौकरीपेशा, समस्त आयकर दातावर्ग, व्यापारियों, निर्माताओं आदि मध्यम तथा उच्च वर्ग को किसानों के विरुद्ध साजिशन खड़ा करने की कोशिश रही है। विभिन्न वर्गों में मत विभाजन तथा ध्रुवीकरण के जरिए सत्ता हासिल करने का स्वाद चखने के बाद अब ये देश के किसान तथा शेष समाज  के बीच खाई खोद रहे हैं। एक तरह से यह  ग्रामीण भारत तथा शहरी इंडिया को एक दूसरे के विरोध में खड़ा कर रहे हैं। गांव वर्सेस शहर की इस विलगाववादी राजनीति से भले ही किसी राजनीतिक पार्टी को कुछ दिनों का अबाध सत्ता सुख मिल जाए लेकिन यह खतरनाक दांव इस देश की एकता अखंडता संप्रभुता, संतुलित विकास व समग्र रूप से देश के उज्जवल भविष्य के लिए गंभीर रूप से घातक है।

इसलिए अब वक्त आ गया है कि देश के आप सभी सरकारी, अर्धसरकारी, सहकारी,कर्मचारी,मजदूर,व्यवसायी व प्रोफेशनल्सू संगठन एकजुट होकर अपनी जरूरी मांगों को भी संलग्न करते हुए किसान आंदोलन के पक्ष में , जो जहां है वहीं पर मजबूती से खड़ा हो, तथा सरकार को या खुल कर बताएं कि आप तथा आपका संगठन देश के किसानों के पक्ष में खड़े हैं, और अगर जरूरत पड़ी तो आगे कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने के लिए भी तैयार हैं।

    इसके कई तात्कालिक व दूरगामी सकारात्मक परिणाम होंगे। सबसे पहले तो सरकार कि यह तोतारटंत बंद होगी  कि यह केवल मुट्ठी भर किसानों का समूह है, और तभी यह किसान आंदोलन व किसानों की स्थिति को सही मायने में समझेगी।

इधर सामने कई राज्यों के चुनाव आ रहे हैं। अगर राजस्थान के छात्र अपने अधिकारों के लिए कांग्रेस का विरोध करने के लिए यूपी आ सकते हैं तो आप सभी संगठन जो आज भी किसी भी रूप में किसान आंदोलन के साथ नहीं जुड़े हैं, आप सब भी भला हमारे आंदोलन में  सक्रिय रूप में शामिल क्यों नहीं हो सकते हैं। तो देश के किसान संगठनों की ओर से हम सब देश के सभी संगठनों से एक बार फिर अपील करते हैं कि आप सभी तत्काल किसान आंदोलन को समर्थन देने हेतु पहले चरण में केवल तत्संबंधी समर्थन पत्र सरकार के लिए जारी करें, तथा एक प्रति हमें भी दें। इससे आगे की रणनीति आप से चर्चा कर तय की जाएगी।

       हम आज इस अपील के साथ ही यह लिखित घोषणा करते हुए आपको यह विश्वास दिलाते हैं, कि आपकी सभी लंबित जायज मांगों के लिए हम सब किसान संगठन आपके साथ कंधे से कंधा मिलाकर किसी भी मजबूत से मजबूत कंपनी अथवा सरकार से लड़ने के लिए तैयार हैं,और जब तक आपके हक और जायज अधिकार आपको नहीं मिल जाते तब तक डटे रहने  के लिए कृत संकल्प हैं। इस देश के अनमोल लोकतंत्र की रक्षा करते हुए, इसे अखंड संप्रभुता संपन्न तथा समृद्ध एवं सुखी राष्ट्र बनाने का यही एक बात रास्ता भी है। तो आएं आज किसान संगठनों की इस अपील पर बिना विलंब किए सकारात्मक प्रतिक्रिया दिखाएं, और देश का आने वाला कल और अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुनिश्चित करें।



(लेखक अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक है।)

Thursday, 2 December 2021

वास्‍तु : कुछ पौधे अपने साथ दुर्भाग्‍य लेकर भी आते हैं....

 


घर में पौधे लगाने के बहुत सारे फायदे हैं। अगर आपने घर में तुलसी, कमल और आर्किड जैसे पौधे लगा रखे हैं तो ये पौधे आपको दो तरह से फायदे देते हैं। पहला तो ये हवा को फिल्टर करते हैं और दूसरा इन्‍हें वास्‍तुशास्‍त्र में काफी लकी प्‍लांट बताया गया है। लेक‍िन क्‍या आप जानते हैं क‍ि कुछ ऐसे भी पौधे होते हैं जो अनलकी यानी क‍ि अशुभ होते हैं। यही नहीं, वास्‍तुशास्‍त्र की मानें तो ये पौधे अपने साथ दुर्भाग्‍य लेकर आते हैं। इसल‍िए इन्‍हें भूलकर भी अपने घर में नहीं लगाना चाह‍िए। तो आइए ऐस्‍ट्रॉलजर ऐंड वास्‍तु एक्‍सपर्ट सच‍िन मेहरा से जानते हैं इन पौधों के बारे में….

 वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार भूलकर भी घर में कपास या फ‍िर रेशमी कपास का पौधा नहीं लगाना चाह‍िए। हालांक‍ि कुछ लोग इन्‍हें सजावटी पौधों के रूप में घर ले आते हैं क्‍योंक‍ि ये काफी खूबसूरत द‍िखते हैं। लेकिन वास्‍तु में इसे अशुभ पौधा माना गया है। मान्‍यता है कि इसमें धूल-म‍िट्टी आसानी से इकट्ठा हो जाती है जो क‍ि घर-पर‍िवार में रहने वाले सदस्‍यों के जीवन में दुर्भाग्य और गरीबी लेकर आती है। इसल‍िए भूलकर भी ये पौधा घर न लेकर आएं।

 वास्तु के अनुसार घर में कभी भी इमली का पौधा नहीं लगाना चाह‍िए। इस पौधे में नकारात्‍मक ऊर्जा का वास होता है। इसल‍िए अगर क‍िसी जमीन पर यह पौधा हो तो वहां मकान बनवाने से बचना चाह‍िए। साथ ही इसे घर या घर के आसपास भी लगाने और क‍िसी को उपहार में देने से भी बचना चाह‍िए।



 वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार बबूल ज‍िसे क‍ि वचेलिया निलोटिका नाम से भी जानते हैं, इसे भी घर में या आसपास नहीं लगाना चाह‍िए। हालांक‍ि यह पौधा औषधीय रूप में काफी महत्‍वपूर्ण होता है। लेक‍िन घर में लगाने के ल‍िए यह ब‍िल्‍कुल भी सही नही हैं। मान्‍यता है क‍ि घर या आसपास भी यह पौधा हो तो घर में रह रहे सदस्‍यों की आपस में नहीं बनती। साथ ही आए द‍िन वाद-व‍िवाद भी होते रहते हैं। इससे कई तरह की मानस‍िक बीमार‍ियों का भी सामना करना पड़ता है।

 वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार घर में या आसपास कभी भी मेंहदी का पौधा नहीं लगाया जाना चाह‍िए। मान्‍यता है क‍ि इस पौधे में बुरी आत्‍माओं का वास होता है। इसल‍िए यह जहां भी होता है वहां आसपास नकारात्‍मक ऊर्जा का संचार होता है। इसल‍िए इसे भी कभी घर में न लगाएं और न ही भूलकर क‍िसी को उपहार में दें।

 वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार ऐसे पौधे जो सूख रहे हों या फ‍िर सड़ने लगें यानी क‍ि डेड प्‍लांट हों तो उन्‍हें तुरंत ही हटा दें। मान्‍यता है क‍ि ये पौधे घर में आने वाली सकारात्‍मक ऊर्जा को रोकते हैं और नेगेट‍िव वाइब्‍स का संचार करते हैं। इसकी वजह से घर में रहने वाले सदस्‍यों को दु:ख और परेशान‍ियों का सामना करना पड़ता है।

नीयत और सोच में खोट, स्त्रियों की कौन-सी "स्वतंत्रता" छीन रहे हैं..?



अर्धनग्न महिलाओं को देख कर  90℅ कौन मजे लेता है। नारी स्वतंत्रता पर सच्चाई जाने, समझें  उस पर एक लेख।

एक दिन मोहल्ले में किसी ख़ास अवसर पर महिला सभा का आयोजन किया गया, सभा स्थल पर महिलाओं की संख्या अधिक और पुरुषों की कम थी..!!

मंच पर तकरीबन  पच्चीस वर्षीय खुबसूरत युवती, आधुनिक वस्त्रों से सुसज्जित, माइक थामें कोस रही थी पुरुष समाज को..!!

वही पुराना आलाप....कम और छोटे कपड़ों को जायज, और कुछ भी पहनने की स्वतंत्रता का बचाव करते हुए, पुरुषों की गन्दी सोच और खोटी नीयत का दोष बतला रही थी!!

तभी अचानक सभा स्थल से...तीस बत्तीस वर्षीय सभ्य, शालीन और आकर्षक से दिखते नवयुवक ने खड़े होकर अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति मांगी..!!

अनुमति स्वीकार कर माइक उसके हाथों में सौप दिया गया ....हाथों में माइक आते ही उसने बोलना शुरु किया..!!

"माताओं, बहनों और भाइयों, मैं आप सबको नहीं जानता और आप सभी मुझे नहीं जानते कि, आखिर मैं कैसा इंसान हूं..?? 

लेकिन पहनावे और शक्ल सूरत से मैं आपको कैसा लगता हुं बदमाश या शरीफ..??

सभास्थल से कई आवाजें गूंज उठीं...पहनावे और बातचीत से तो आप शरीफ लग रहे हो...शरीफ लग रहे हो...शरीफ लग रहे हो....

बस यही सुनकर, अचानक ही उसने अजीबोगरीब हरकत कर डाली...सिर्फ हाफ पैंट टाइप की अपनी अंडरवियर छोड़ कर के बाक़ी सारे कपड़े मंच पर ही उतार दिये..!!

ये देख कर ....पूरा सभा स्थल आक्रोश से गूंज उठा, मारो-मारो गुंडा है, बदमाश है, बेशर्म है, शर्म नाम की चीज नहीं है इसमें....मां बहन का लिहाज नहीं है इसको, नीच इंसान है, ये छोड़ना मत इसको....

ये आक्रोशित शोर सुनकर...अचानक वो माइक पर गरज उठा..."रुको...पहले मेरी बात सुन लो, फिर मार भी लेना, चाहे तो जिंदा जला भी देना मुझको..!!

अभी अभी तो....ये बहन जी कम कपड़े, तंग और बदन नुमाया छोटे-छोटे कपड़ों के पक्ष के साथ साथ स्वतंत्रता की दुहाई देकर गुहार लगाकर.."नीयत और सोच में खोट" बतला रही थी...!!

तब तो आप सभी तालियां बजा-बजाकर सहमति जतला रहे थे..फिर मैंने क्या किया है..?? सिर्फ कपड़ों की स्वतंत्रता ही तो दिखलायी है..!!

नीयत और सोच" की खोट तो नहीं ना और फिर मैने तो, आप लोगों को...मां बहन और भाई भी कहकर ही संबोधित किया था..फिर मेरे अर्द्ध नग्न होते ही....आप में से किसी को भी मुझमें "भाई और बेटा" क्यों नहीं नजर आया..?? 

मेरी नीयत में आप लोगों को खोट कैसे नजर आ गया..?? मुझमें आपको सिर्फ "मर्द" ही क्यों नजर आया? भाई, बेटा, दोस्त क्यों नहीं नजर आया? आप में से तो किसी की "सोच और नीयत" भी खोटी नहीं थी...फिर ऐसा क्यों?? "

सच तो यही है कि.....झूठ बोलते हैं लोग कि..."वेशभूषा" और "पहनावे" से कोई फर्क नहीं पड़ता।


हकीकत तो यही है कि मानवीय स्वभाव है कि किसी को सरेआम बिना "आवरण" के देख लें तो कामुकता जागती है मन में...रूप, रस, शब्द, गन्ध, स्पर्श। ये बहुत प्रभावशाली कारक हैं। इनके प्रभाव से “विश्वामित्र” जैसे मुनि के मस्तिष्क में विकार पैदा हो गया था..जबकि उन्होंने सिर्फ रूप कारक के दर्शन किये..आम मनुष्यों की विसात कहाँ..??

दुर्गा शप्तशती के देव्या कवच में श्लोक 38 में भगवती से इन्हीं कारकों से रक्षा करने की प्रार्थना की गई है..

“रसेरुपेचगन्धेचशब्देस्पर्शेचयोगिनी।सत्त्वंरजस्तमश्चैवरक्षेन्नारायणी_सदा।।”

रस रूप गंध शब्द स्पर्श इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करें तथा सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण की रक्षा नारायणी देवी करें.!!

अब बताइए, हम भारतीय हिन्दु महिलाओं को "हिन्दु संस्कार" में रहने को समझाएं तो स्त्रियों की कौन-सी "स्वतंत्रता" छीन रहे हैं..??

सोशल मीडिया पर अर्ध-नग्न होकर नाचती 90% कन्याएँ-महिलाएँ..हिंदू हैं..और मज़े लेने वाले 90% कौन है⁉️ये बताने की भी ज़रूरत है क्या..?

आँखे खोलिए…संभालिए अपने आप को और अपने समाज को, क्योंकि भारतीय समाज  और संस्कृति का आधार नारीशक्ति है और धर्म विरोधी, अधर्मी, चांडाल (बॉलीवुड, वामपंथ) ये हमारे समाज के आधार को तोड़ने का षड्यंत्र कर रहे हैं..!!✍

परम्परागत सनातन धर्म की रक्षा का दायित्व हम सभी पर है।

Monday, 29 November 2021

एकादशी व्रत : सुख-समृद्धि प्रदान करता है यह व्रत, यह उपाय अपनाएं


भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित एकादशी व्रत बहुत पावन व्रत माना जाता है। प्रत्येक माह दो एकादशी का व्रत रखा जाता है। एकादशी व्रत में भगवान श्री हरि विष्णु की विशेष आराधना की जाती है। एकादशी तिथि पर वास्तु के मुताबिक, कुछ विशेष उपाय करने से जीवन से समस्याएं दूर हो जाती हैं और घर-परिवार में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
एकादशी व्रत बहुत ही पुण्यदायी व्रत है। इस दिन विधि-विधान से पूजा-पाठ करने से हर पाप का नाश होता है। इस तिथि पर घर में पौधे रोपें। घर की पूर्व दिशा में तुलसी जी का पौधा लगाएं। इस दिन केले के वृक्ष की जड़ में दीपक जलाएं। एकादशी के दिन घर की छत पर गेंदे के पुष्प का पौधा लगाने से दांपत्य जीवन में मधुरता और घर में सुख शांति आती है। घर की छत पर पीला ध्वजा लगाएं। इस दिन दंपति को आंवले का पौधा घर के आंगन में रोपना चाहिए। एकादशी पर पका हुआ भोजन नहीं करना चाहिए। इस दिन सात्विक रहें। दूषित विचार तक मन में न लाएं। इस दिन भगवान श्री हरि को पीले रंग के पुष्प अर्पित करें। भगवान विष्णु की पूजा करते समय खीर का भोग लगाएं। खीर में तुलसी की पत्तियां अवश्य डालें। इस दिन पीले रंग के फल, कपड़े व अनाज भगवान विष्णु को अर्पित करें। जरूरतमंदों को दान दें। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें। घर के पूजा स्‍थान पर कलश की स्‍थापना करें। कलश के ऊपर भगवान श्री हरि विष्‍णु की मूर्ति स्थापित करें। सुगंधित फूल, नारियल, मिष्ठान्न, ऋतुफल और तुलसी दल भगवान विष्णु को समर्पित करें। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। श्रीहरि की आरती करें। रात्रि जागरण करें। भगवान श्री हरि विष्णु के भजन-कीर्तन में समय व्यतीत करें।

 

Winter FOOD: सरसों का साग और मक्की की रोटी

 


सरसों का साग और मक्की की रोटी पॉपुलर पंजाबी डिश है। यह एक ऐसी क्लासिक डिश है जिसे हर कोई बहुत स्वाद से खाता है। यह एक ऐसी​ डिश है जो सिर्फ सर्दियों के मौसम में ही खाने को मिलती है। सरसों के साग में ढेर सारा घी और मक्खन डालकर खाने से इसका स्वाद दोगुना हो जाता है।

सरसों का साग बनाने के लिए सामग्री: सरसों का साग बनाते समय में इसमें सरसों के पत्तों के साथ बथुआ और पालक भी डाला जाता है। उबाल कर पीसने के बाद साग को प्याज, टमाटर आदि का तड़का दिया जाता है।

वैसे तो साग और मक्की की रोटी का बेस्ट कॉम्बिनेशन हैं। लेकिन आप इसके साथ छाछ या लस्सी भी सर्व कर सकते हैं।

चलिए जानते हैं इसके लिए लगने वाली सामग्री

साग के लिए:

750 ग्राम सरसों का साग, 250 ग्राम पालक का साग, 250 ग्राम बथुए का साग, 2 कप पानी, एक चुटकी नमक, 1 1/2 कप मक्की का आटा, 4 हरी मिर्च

25 ग्राम अदरक,6 लहसुन की कली, 2 प्याज, घी, 1/2 टी स्पून लाल मिर्च पाउडर, 1/2 टी स्पून गरम मसाला, 1/2 टी स्पून धनिया पाउडर। 



मक्की की रोटी:

1/2 kg मक्की का आटा, आटा गूंथने के लिए पानी, तलने के लिए घी


जानते हैं ...सरसों का साग और मक्की की रोटी बनाने की वि​धि

1.प्रेशर कुकर में तीनों साग को डालें उसमें नमक और पानी डालकर धीमी आंच पर 1 1/2 घंटे तक पकाएं।

2.साग का पानी निचोड़कर निकाल लें और पानी को एक तरफ रख दें। साग को कुकर में अच्छे से मैश करें, इसमें मक्की का आटा डालकर कर चलाएं।

3.साग का पानी उसमें वापस डाल दें साथ ही नॉर्मल ताजा पानी डालकर कर इसे धीमी आंच पर पकाएं।

4.हरी मिर्च और अदरक डालकर साग को गाढ़ा होने तक पकाएं।

5.तड़का तैयार करने के लिए प्याज, अदरक, लहसुन, लाल मिर्च, गरम मसाला, धनिया डालकर भूनें, प्याज को गोल्डन ब्राउन होने दें।

6.तड़के को साग में डालकर मिक्स करें कटी अदरक से गार्निश करें।

मक्की की रोटी :

1.मक्की का आटा लें और गूंथ लें।

2.तवा गर्म कर करें और उस पर थोड़ा सा घी डालें ताकि रोटी उस पर चिपके नहीं।

3.चकले पर गोल आकार की मक्की की रोटी तैयार कर लें। इसके बाद बहुत आराम से तवे पर डालें।

4.रोटी पर घी लगाकर गोल्डन ब्राउन होने तक सेकें।

5.रोटी को सरसों का साग, गुड़ और सफेद मक्खन के साथ सर्व करें।

Wednesday, 17 February 2021

वसंत पंचमी के दिन बेबी समीक्षा साहा का हाथे खोड़ी यानि विद्या आरंभ संस्कार किया गया

वसंत पंचमी के दिन बेबी समीक्षा साहा का हाथे खोड़ी यानि विद्या आरंभ संस्कार किया गया। ‘हाते खोड़ी’ जिसका अर्थ है ‘हाथ में चाक ’ एक बंगाली परंपरा है जिसमें बच्चे अपना पहला अक्षर लिखते हैं। यह बच्चे की शाब्दिक यात्रा की शुरुआत माना जाता है। ‘हाथे खोड़ी’ सरस्वती पूजा या वसंत पंचमी (वसंत का पांचवा दिन) के दिन किया जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, सरस्वती विद्या, ज्ञान, कला और संगीत की देवी हैं। तो, बच्चे इस दिन से देवी सरस्वती के आशीर्वाद से लिखना शुरू करते हैं। परंपरा के अनुसार, छोटे बच्चों को पंडित की गोद में बैठाकर या समीप में बैठाकर नई स्लेट में चाक से मुख्य रूप से पहले अक्षर ओएम या ए, बी, सी, 1 से 10 तक गिनती या कुछ बंगाली वर्णमाला जैसे "के-ए", "ख-ए" लिखवाते हैं।



‘हाते खोड़ी’ एक पुजारी और दोस्तों और परिवार की उपस्थिति में आयोजित की जाती है। परंपरागत रूप से, एक नया चाक और स्लेट / चॉकबोर्ड रखा जाता है और पुजारी बच्चे को अपना पहला अक्षऱ लिखने में मदद करता है। यदि चाक और बोर्ड उपलब्ध नहीं है, तो एक नोटबुक और पेन / पेंसिल का भी उपयोग किया जा सकता है।





Sunday, 7 February 2021

गुलाब के हर रंग हैं खास, जानें किस रंग के गुलाब की क्या है खासियत

प्यार का इजहार करने के लिए Valentine Week की 7 फरवरी से शुरुआत होने जा रही है। सप्ताह का पहला दिन Rose Day के तौर पर सेलिब्रेट किया जाता है। इस दिन गुलाब के फूल देकर अपने पार्टनर के सामने अपनी भावनाओं का इजहार किया जाता है। इस दिन अपने इमोशन्स को बताने के लिए गुलाब के फूलों का सबसे ज्यादा महत्व है यही वजह है कि प्यार के इस सप्ताह के पहले दिन का नाम Rose Day रखा गया है।


अलग अलग तरह की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए अलग-अलग रंगों के गुलाब के फूलों का इस्तेमाल किया जाता है। लाल रंग का गुलाब कुछ कहता है तो वहीं गुलाबी या पीले रंग के गुलाब से कुछ अलग तरह की भावनाएं व्यक्त की जाती हैं।

गुलाब के रंगों की खासियत

लाल रंग

लाल गुलाब का पारंपरिक तौर पर प्यार का इजहार करने के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है। माना जाता है कि प्यार का रंग लाल है ऐसे में अपने पार्टनर के सामने प्यार जताने के लिए Red Rose दिया जाता है। अगर पहली बार प्यार का इजहार करने जा रहे हैं तो लाल रंग का गुलदस्ता बेहद काम का साबित हो सकता है।

पीला रंग

लाल रंग का गुलाब जहां प्यार का इजहार करने के लिए है तो वहीं पीले रंग का गुलाब दोस्ती का प्रतीक होता है। नई दोस्ती की शुरुआत के लिए पीले रंग का गुलाब दिया जाता है। इसका मतलब है कि आप एक बहुत अच्छे दोस्त हैं। अगर आप अब रोमांटिक रिलेशनशिप में नहीं हैं तो पीले रंग का गुलाब देकर अपनी दोस्ती की भावनाओं को व्यक्त किया जा सकता है।

सफेद रंग


सफेद रंग का गुलाब सबसे शुद्ध माना जाता है। सफेद रंग शुद्धता, मासूमियत और आकर्षण का प्रतीक माना जाता है। इनका मुख्य तौर पर इस्तेमाल शादियों में किया जाता है जिसका मतलब नई शुरुआत और सदाबहार प्यार से होता है। सफेद रंग के गुलाब को दुल्हन का गुलाब भी कहते हैं।


बैंगनी रंग


बैंगनी रंग का गुलाब रंगों के लिहाज से बेहद अनूठा है। अगर किसी को देखते हुए आप पकड़ा गए हैं तो बैंगनी रंग के गुलाब को दिया जा सकता है। यह सीक्रेट क्रश भी हो सकता है।

गुलाबी रंग


गुलाबी रंग का Rose इसकी सबसे ज्यादा विविधता वाला रंग है। इस रंग का गुलाब आभार व्यक्त करने के लिए किया जाता है। हालांकि वेलेंटाइन वीक में इसका इस्तेमाल करने से बचें।

क्रीम रंग


क्रीम कलर का गुलाब आकर्षण और शानदार विचारश्रृंखला का प्रतीक है। क्रीम गुलाब आम तौर पर पिंक कलर के गुलाब के साथ मिक्स कर दिया जाता है। अगर किसी को गुलाब का बुके देना है तो इन दोनों गुलाब को साथ में ना रखें।


Happy Rose Day


 

Friday, 1 January 2021

दिल में बसा लो आने वाले साल को

सुजाता साहा

साल 2021 की शुरुआत हो गई है. नया साल जीवन में नई खुशियां लेकर आए, इस वजह से लोग तरह-तरह के उपाय करते हैं. मंगलकामनाओं के साथ नए संकल्प लेते हैं. अगर आप मौजूदा वर्ष की चुनौतियों, संघर्षों और अशुभताओं को नए साल में नहीं लेकर जाना चाहते।



2020 को सबसे ज्यादा नकारात्मक कोरोना वायरस की वजह से माना जाता है, कई लोगों का कहना है कि ये पूरा साल ही कोरोना की वजह से खराब हो गया। इसलिए अब लोगों को 2021 से बहुत उम्मीदें है। 2021 का खास इंतजार इसलिए भी है कि नए साल में लोगों को कोरोना वैक्सान के नाम को तोहफा भी मिल सकता है। असल में ऐसी उम्मीद है कि भारत में नए साल की शुरुआत के साथ ही भारतीयों को कोविड-19 वैक्सीन दी जा सकती है।

राजधानी दिल्ली में कोरोना को देखते हुए पहले ही नए साल के जश्न को लेकर गाइडलाइन्स जारी कर दी हैं। नए साल की पूर्व संध्या पर ट्रैफिक पुलिस और स्थानीय पुलिस सड़कों पर मुस्तैद रहेगी।

नए साल का जश्न कई देशों में अलग-अलग वक्त पर मनाया गया. सबसे पहले आर्कटिक देश टोंगा में 2021 दस्तक दिया. हालांकि, मुख्य रूप से न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया ऐसे देश हैं जहां भारतीय समयानुसार जल्दी नया साल आ गया। भारत के वक्त के अनुसार, गुरुवार दोपहर 3.30 बजे यहां नया साल आ गया। 

भारत में नए साल को देखते हुए काफी सतर्कता बरती जा रही है. नए साल से ठीक पहले कोरोना का नया स्ट्रेन भारत में आया है, ऐसे में कई राज्यों ने अपने यहां नाइट कर्फ्यू लगा दिया है. नई दिल्ली, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात समेत कई राज्यों ने अपने यहां पूर्ण या आंशिक रूप से नाइट कर्फ्यू लगाया है. 



रात 11 बजे के बाद बाहर निकलने पर मनाही है, भीड़ में ना जाने की सलाह है और साथ ही ड्राइविंग करने वालों को ब्लड टेस्ट करवाना पड़ सकता है. ऐसे में कोरोना से जुड़ी गाइडलाइन्स का पालन करते हुए ही लोग नया साल मनाएं, ताकि कोई दिक्कत ना हो.

साल का पहला दिन अगर लोग उत्साहित होकर खुशी-खुशी मनाएंगे तो पूरा साल खुशनुमा बीतेगा। इस दिन जहां कुछ लोग मंदिर और घर में पूजा-पाठ व हवन का आयोजन करते हैं। वहीं, कई लोग शाम होते ही पार्टी करने लगते हैं। नाच-गाना और स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ-साथ मजेदार खेलों के माध्यम से खुद को और बाकियों को एंटरटेन करते हैं।

नया साल खुद में नई सोच- उम्मीद विकसित करने का और ऊर्जा संचय का समय होता है। पिछली असफलताओं, पुरानी परेशानियों से सबक लेते हुए पूरी सावधानी से नया कदम उठाने की देर है।

भूल जाओ बीते हुए कल को

दिल में बसा लो आने वाले कल को

मुस्कुराओ चाहे जो भी हो पल

खुशियां लेकर आएगा आने वाला कल।।


Thursday, 28 May 2020

बचपन की चुलबुलाहट से लेकर एक सशक्त महिला तक का सफर तय करती, गाँजे की कली

देश की सुप्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम की छत्तीसगढ़ी कहानी पर आधारित व राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित फ़िल्म गाँजे की कली योगेन्द्र चौबे के निर्देशन में तैयार की गई यह फिल्म दर्शकों के सामने एक सवाल छोड़ती है। आमतौर पर बनने वाली छत्तीसगढ़ी फिल्मों से यह फिल्म काफी अलग है। एक विद्रोह करने वाली महिला पर आधारित फिल्म है, जो बचपन की चुलबुलाहट से लेकर एक सशक्त महिला तक का सफर तय करती है। छत्तीसगढ़ की पहली कला फ़िल्म गाँजे की कली यु ट्यूब में रिलीज हो चुकी है। इस फ़िल्म को देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी अच्छी प्रतिक्रिया आ रही है। देश भर में फ़िल्म रंगमंच साहित्य कला से जुड़े लोगों की प्रतिक्रिया आ रही है। अमेरिका, जर्मनी, इंग्लैंड,आस्ट्रेलिया नेपाल में रहने वाले भारतीयों द्वारा भी इस फ़िल्म को देखा व पसंद किया गया। है।छत्तीसगढ़ की इस कला फ़िल्म को अब तक 4 हजार से अधिक व्यूज मिल चुके हैं। 

बचपन की चुलबुलाहट से लेकर एक सशक्त महिला तक का सफर तय करती, गाँजे की कली

गाँजे की कली यह पहली छत्तीसगढ़ी फ़िल्म है जो छत्तीसगढ़ से बाहर निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। इस फ़िल्म की पहली स्क्रिनिग जागरण अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवल के तहत दिल्ली व मुम्बई रायपुर में हुई थी। फिर देश के कई शहरों भोपाल, ग्वालियर खैरागढ़, रायगढ़, वर्धा नागपुर, इलाहाबाद , गोरखपुर बिलासपुर में इसका विशेष प्रदर्शन भी किया गया।


भारतीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित अभिनेत्री नेहा सराफ का रंगमंच का अनुभव सघन है। इस फिल्म में भी वे चुलबुली लडक़ी से लेकर एक सशक्त महिला का किरदार , बड़ी सहजता के साथ निभाती हैं, जो कि दर्शक को गंभीर विमर्श के लिए तैयार करता है । नेहा बॉलीवुड की कई चर्चित फिल्मों हीरोइन, लुका छिपी ,ड्रीमगर्ल जैसी फिल्मों में उन्होंने काम किया है। इसके साथ ही अघनिया के पिता की भूमिका में दीपक तिवारी ' विराट ' का सहज अभिनय उनकी रंगमंच के परिश्रम का फलन है। पूनम तिवारी द्वारा निभाए किरदार द्वारा अघनिया को रंगीलाल के यहां से भागने में मदद करना, पुरुषवादी मानसिकता से उपजे नारी के मानसिक शोषण के विरुद्ध क्रांति - बिगुल है जिसने पूरी कहानी को मोड़ दिया। दीपक तिवारी और पूनम तिवारी हबीब तनवीर व नया थियेटर के चर्चित अभिनेता -अभिनेत्री हैं जिनके गीत व अभिनय की चर्चा देश भर में होती है। फिल्म के अंत में कर्मा गीत पूनम तिवारी के स्वर में धोखे के बाद उपजी निराशा का प्रतीक है, पर कहानी आगे बढ़ती है और आपको निराश नहीं करती। 


छत्तीसगढ़ की सत्य घटना पर आधारित फ़िल्म में राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों के कलाकारों ने काम किया है। इस फ़िल्म की पटकथा व संवाद राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित अशोक मिश्रा ने लिखी है इसी तरह फ़िल्म की एडिटिंग असीम सिन्हा द्वारा किया गया है। असीम सिन्हा बॉलीवुड के मशहूर एडिटर है ज़ेडप्ल्स, वेलडन अब्बा, वेलकम टू सज्जनपुर, मोहल्ला अस्सी, संविधान जैसे कई फिल्मों के एडिटर हैं। तकनीकी दृष्टिकोण से भी यह ऐसी पहली फ़िल्म है जो सिंक साउंड है इस फ़िल्म में डबिंग नहीं किया गया, बल्कि लोकेशन साउंड रिकार्ड किया गया है। इसके साउंड डिजाइनर संतोष कुमार है। इस फ़िल्म के सिनेमेटोग्राफर राजीब शर्मा हैं जिन्हें फोटो ग्राफी के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत किया जा चुका है। फ़िल्म का टाइटल भी अनोखा है इसका डिजाइन रायपुर की एनिमेटर आस्था कपिल चौबे द्वारा किया गया है। फ़िल्म में संगीत छत्तीसगढ़ के युवा संगीत निर्देशक चंद्रभूषण वर्मा ने दिया है।