- सुजाता साहा
"पर उपदेस कुसल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे।"
सदियों पहले कही गई गोस्वामी तुलसीदास की यह पंक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी अपने समय में थी। समय बदल गया, तकनीक बदल गई, संवाद के माध्यम बदल गए, लेकिन इंसान की एक आदत नहीं बदली, दूसरों को सीख देना आसान लगता है, जबकि स्वयं उसी सीख पर चलना बेहद कठिन।
आज सोशल मीडिया का दौर है। हर दिन हजारों प्रेरणादायक पोस्ट, नैतिक विचार और आदर्शों से भरे संदेश हमारी स्क्रीन पर दिखाई देते हैं। लोग ईमानदारी, अनुशासन, संवेदनशीलता, पर्यावरण संरक्षण, महिला सम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी पर लंबी-लंबी बातें करते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम उन बातों को अपने जीवन में भी उतारते हैं? अक्सर इसका उत्तर निराशाजनक होता है।
शब्द केवल दिखावा
आज बहुत-से लोग वही कहते हैं जो सुनने में अच्छा लगे। आदर्शवादी बातें करना आसान है, क्योंकि उनसे हमारी छवि बेहतर बनती है। लोग हमें समझदार, जागरूक और संवेदनशील मानने लगते हैं, लेकिन असली परीक्षा तब होती है, जब वही सिद्धांत हमारे अपने जीवन पर लागू होते हैं। दूसरों को समय की पाबंदी सिखाने वाला व्यक्ति स्वयं देर से पहुँचता है। ईमानदारी का भाषण देने वाला छोटी-सी सुविधा के लिए नियम तोड़ देता है। नैतिकता की बातें करने वाला अपने स्वार्थ के सामने उन्हीं मूल्यों से समझौता कर लेता है। यहीं से कथनी और करनी का अंतर शुरू होता है।
विश्वास क्यों टूटता है?
सबसे बड़ी चोट तब लगती है, जब हम किसी व्यक्ति की बातों पर भरोसा कर लेते हैं। हमें लगता है कि उसके शब्द ही उसका चरित्र हैं। लेकिन समय आने पर जब उसका व्यवहार बिल्कुल उल्टा दिखाई देता है, तो केवल विश्वास ही नहीं टूटता, बल्कि रिश्तों की नींव भी हिल जाती है। शब्दों से पैदा हुआ भरोसा, कर्मों की परीक्षा में अक्सर बिखर जाता है।
काम ही असली पहचान
जीवन हमें धीरे-धीरे यह सिखा देता है कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके भाषणों, वादों या सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं करना चाहिए। असल पहचान उसके रोजमर्रा के व्यवहार में छिपी होती है। कोई व्यक्ति कठिन समय में कैसा निर्णय लेता है, दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करता है, अपने स्वार्थ से ऊपर उठ पाता है या नहीं, यही उसके चरित्र की वास्तविक कसौटी है। शब्द हवा में खो जाते हैं, लेकिन कर्म लोगों के दिलों और समाज की स्मृतियों में लंबे समय तक जीवित रहते हैं।
शुरुआत कहाँ से होगी?
हम अक्सर समाज बदलने की बात करते हैं। लेकिन समाज किसी एक संस्था का नाम नहीं है। समाज हम सब मिलकर बनाते हैं। इसलिए बदलाव की शुरुआत भी हमारे अपने व्यवहार से ही होगी। यदि हम चाहते हैं कि लोग ईमानदार हों, तो पहले हमें स्वयं ईमानदारी निभानी होगी। यदि हम चाहते हैं कि लोग संवेदनशील बनें, तो पहले हमें अपने व्यवहार में संवेदनशीलता दिखानी होगी। यदि हम चाहते हैं कि समाज में विश्वास बढ़े, तो हमें अपने शब्दों और कर्मों के बीच की दूरी कम करनी होगी। दुनिया को उपदेश देने से कहीं अधिक प्रभावशाली है, स्वयं एक उदाहरण बन जाना।
जीवन की सबसे बड़ी सच्चाइयों में से एक यह है कि लोग आपकी बातें कुछ समय तक याद रखते हैं, लेकिन आपके काम उन्हें जीवन भर याद रहते हैं। इसलिए कोशिश यही होनी चाहिए कि हमारी पहचान हमारे शब्दों से नहीं, बल्कि हमारे चरित्र और काम से बने।
"कथनी से प्रभावित लोग कुछ समय साथ चलते हैं,
लेकिन करनी से प्रभावित लोग जीवन भर सम्मान देते हैं।"





























