Friday, 6 December 2019

तिरुपति धार्मिक आस्था के साथ पर्यटन का भी एक बेहतर केंद्र

- सुजाता साहा

हमारे देश में धार्मिक पर्यटन की एक लंबी परंपरा है आज से कुछ साल पहले तक लोग चारों धामों की यात्रा पर या तो बहुत प्रसिद्ध मंदिरों, नदियों, हिमालय की ओर जाते थे। पर अब धीरे-धीरे धार्मिक यात्राओं के साथ-साथ कई तरह के पर्यटन पर लोग जाते हैं और उसमें पहाड़, नदी, बर्फीली जगह, समुद्र तथा कमर्शियल सेंटर, मनोरंजन स्थल, स्वास्थय केंद्र शामिल हैं। विदेशों में भी पर्यटन की अभिरूचि लोगों में तेजी से बढ़ी है। इस सबके बावजूद अभी भी कुछ धार्मिक स्थान है, जहां सर्वाधिक लोग अपनी धार्मिक आस्थाओं के साथ प्रकृति का आनंद लेने के लिए जाते हैं उनमें सर्वाधिक लोकप्रिय है तिरुपति बालाजी का मंदिर। यह मंदिर आंध्रप्रदेश में स्थित तिरूपति और नगर की जिस पहाड़ी पर मंदिर बना है उसे तिरूमला कहते हैं। इस पहाड़ी को शेषांचलम भी कहा जाता है। पहाड़ी सांप के आकार सी प्रतीत होती है, जिसकी सात चोटियां हैं जो आदि शेष के फनों की प्रतीक मानी जाती हैं। इन सात चोटियों के नाम क्रमश: शेषाद्रि, नीलाद्रि, गरू़डाद्रि, अंजनाद्रि, वृषभाद्रि, नारायणाद्रि और वैंकटाद्रि हैं। वैंकटाद्रि पर्वत में बालाजी का मंदिर है।

साल के 12 महीनों में एक भी दिन ऐसा नहीं जाता, जब बालाजी के दर्शन करने के लिए भक्तों का तांता न लगा हो। यह भारत के उन चुनिंदा मंदिरों में से एक है जिसके पट सभी धर्मानुयायियों के लिए हमेशा खुले हुए हैं। यह मंदिर भारत ही नहीं विश्व के सबसे अधिक तीर्थयात्रियों के आकर्षण का केंद्र है। इसके साथ ही इसे विश्व के सर्वाधिक धनी धार्मिक स्थानों में से भी माना जाता जहां रोजाना 25 हजार से ज्यादा लोग बालाजी के दर्शन करते हैं।

कैसा जाया जाए बालाजी?

तिरुपति चेन्नई से 130 किलोमीटर दूर स्थित है, जो एक मुख्य रेलवे स्टेशन भी है। यहां से रायपुर, विशाखापट्टनम, हैदराबाद, बेंगलुरु और चेन्नई के लिए सड़क व रेल व्यवस्था भी है। इसके साथ ही तिरुपति पर एक छोटा-सा हवाई अड्डा भी है। तिरुपति रेलवे स्टेशन से तिरूमला के लिए बस सुविधा उपलब्ध है। पैदल यात्रियों हेतु पहाड़ी पर चढ़ने के लिए तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम नामक एक विशेष मार्ग बनाया गया है। जब तिरुपति टोल से निकले तो सामानों को स्कैनिंग से गुजरना पड़ा। ऐसा सुरक्षा की दृष्टि से किया जाता है। अगर वहाँ के सुरक्षाकर्मियों को शक होगा तो वो समान की खोलकर भी तलाशी लेंगे। उसके पश्चात तिरुपति से तिरुमला की ओर घुमावदार सड़कों से होते हुए मनोरम प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेते हुए ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम देवलोक में आ गये हैं, सुबह का वक्त हरियाली और बादलों के बीच चलने की अनुभूति देता हो बस... और हम तिरुमाला पहुँच गये। सबसे अच्छी बात यह है कि तिरुपति से तिरुमाला जाने का मार्ग अलग और आने का मार्ग अलग है, क्योंकि बहुत ही घुमावदार सड़कें हैं और बहुत सारे घाटी पार करना होते हैं।



श्रृद्धालु की सुविधा के लिए तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) ने इंटरनेट पर ऑनलाइन टिकट की व्यवस्था भी कराई है। https://ttdsevaonline.com/#/login जो बहुत जरूरी भी है। ऑनलाइन दर्शन और रूम बुकिंग कर लिया जाए, तो यात्रा सुखद होगी। नहीं तो तिरुपति पहुंच कर अगर आप हॉटल लेने की सोचे तो बता दूं तिरुमला में एक भी हॉटल नहीं है। वहां टीटीडी की सारी व्यवस्था देखता है। रूम लेने लंबी प्रक्रिया से गुजरना होगा। ऑनलाइन दर्शन का शुल्क 300 रुपए निर्धारित किया गया है| जिससे आपको 2-3 घंटे में बालाजी के दर्शन हो जाएंगे। साथ ही 2 लड्डू प्रसाद के भी मिलेंगे। शीघ्र दर्शन की रिपोर्टिंग करने जाये तो किसी भी प्रकार का लगेज, फ़ोन या अन्य कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण न ले जाये अन्यथा आपको परेशानी हो सकती है| हां अपना ऑनलाइन बुकिंग के रसीद का प्रिंटआउट, आधार कार्ड जरूर ले जाए अन्यथा दर्शन से वंचित हो सकते हैं।

मन्दिर प्रशासन ने पुरुषों के लिए ड्रेस कोड धोती – शर्ट या कुर्ता-पायजामा निर्धारित किया है वहीं महिलाओं के लिए साड़ी-सलवार सूट का प्रावधान है| दर्शन प्रवेश के बाद पूरा माहौल गोविंदामय हो जाता है। सभी श्रद्धालु गोविंदा-गोविंदा का जाप करते आगे बढ़ते जाते हैं। और स्वामीवारि के पुण्य दर्शन हो जाएंगे।

हमारी सुखद और अविस्मरणीय यात्रा

तिरुमला पहुंच कर हमने रूम जो ऑनलाइन बुक किया था, की चाबी लेकर लगेज रखकर केशदान के लिए गए। इस मंदिर में जो लोग दर्शन करने आते हैं वे अपने सिर के बालों को चढ़ाते हैं। यह बाल उनकी आर्थिक सहायता करते हैं। ताकि वे धन कुबेर का ऋण उतार सकें। मालूम हो कि पद्मावती से शादी के वक्त बालाजी ने कुबेर से ऋण लिया था। केशदान के अंतर्गत श्रद्धालु प्रभु को अपने केश समर्पित करते हैं जिससे अभिप्राय है कि वे केशों के साथ अपना  अभिमान, आंडबर ईश्वर को समर्पित करते हैं। मंदिर के पास स्थित 'कल्याण कट्टा' नामक स्थान पर यह सामूहिक रूप से संपन्न किया जाता है। यहां एक टोकन दिया जाता है और आधी ब्लेड, अंदर हाल में पहुँचे तो देखा कि बहुत सारे बाल काटने वाले वहाँ बैठे हुए हैं, और हमारे टोकन पर जिस बाल काटने वाले का नंबर लिखा हुआ था, हम भी उसके सामने लाईन में जाकर खड़े हो गये। और केशदान किया। केशदान के पश्चात यहीं पर स्नान करते हैं और फिर पुष्करिणी में स्नान के पश्चात मंदिर में दर्शन करने के लिए जाते हैं। वैसे अब जहां आपने रूम लिया वहां भी कल्याण कट्टा की व्यवस्था की गई है। ताकि आपको परेशानी न हो। यह सेवा फ्री है।

स्वच्छ भारत अभियान में शामिल तिरुपति

सबसे अच्छी बात तिरुमला में तमिल, तेलुगू, हिन्दी और अंग्रेजी में सभी तरह के संदेश लिखे हुए हैं, किसी से कुछ भी पूछने की जरुरत नहीं पड़ती है। और सफाई की बात की जाए तो... कहीं कचरा ही नहीं... इतना साफ-सुथरा शहर है तिरुपति। एक ओर जब देश के कुछ मंदिरों, धार्मिक स्थलों में जाते हैं तो वहां गंदगी और अव्यवस्था, पंडों की लूट के दृश्य देखते हैं तो हमारा मन खराब होता है किन्तु तिरुपति में हमें ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता है। तिरुपति को केंद्र सरकार की स्वच्छ भारत अभियान में शामिल किया गया है। तिरुमला में भक्तों के लिये सभी सुविधाएँ मुफ़्त उपलब्ध हैं या फ़िर बहुत ही कम दामों पर। तिरुमाला में बसें लगातार चलती रहती हैं, जिससे आप एक स्थान से दूसरे स्थान जा सकते हैं, वो भी मुफ़्त में, और बसें भी विशेष प्रकार की हैं, जैसे भगवान का खुद का रथ हो।



सर्वदर्शनम- सर्वदर्शनम से अभिप्राय है 'सभी के लिए दर्शन'। सर्वदर्शनम के लिए प्रवेश द्वार वैकुंठम काम्प्लेक्स है। वर्तमान में टिकट लेने के लिए यहां कम्प्यूटरीकृत व्यवस्था है। यहां पर निःशुल्क व सशुल्क दर्शन की भी व्यवस्था है। साथ ही विकलांग लोगों के लिए 'महाद्वारम' नामक मुख्य द्वार से प्रवेश की व्यवस्था है, जहां पर उनकी सहायता के लिए सहायक भी होते हैं।

अन्न प्रसाद व लड्डू प्रसाद

तिरुमला में चौबीसों घटें अन्न प्रसाद की व्यवस्था है जिसके अंतर्गत चरणामृत, मीठी पोंगल, दही-चावल जैसे प्रसाद तीर्थयात्रियों को दर्शन के पश्चात दिया जाता है। लड्डू मंदिर के बाहर बेचे जाते हैं, जो यहां पर प्रभु के प्रसाद रूप में चढ़ाने के लिए खरीदे जाते हैं। इन्हें खरीदने के लिए पंक्तियों में लगकर टोकन लेना पड़ता है। श्रद्धालु दर्शन के उपरांत लड्डू मंदिर परिसर के बाहर से खरीद सकते हैं। तिरुपति का सबसे प्रमुख पर्व 'ब्रह्मोत्सवम' है जिसे मूलतः प्रसन्नता का पर्व माना जाता है। 9 दिनों तक चलने वाला यह पर्व साल में एक बार सितंबर या अक्टूबर को मनाया जाता है।

यह मंदिर सबसे अमीर मंदिरों में से एक माना जाता है। यहां हर वर्ग के लोग बालाजी के दर्शन करने आते हैं। यहां फिल्मी सितारों से लेकर राजनेता आदि सभी दर्शन करने आते हैं। इस मंदिर को लेकर कई मान्यताएं विश्वास हैं। जिसकी वजह से यह इतना प्रसिद्ध है।

बालाजी मंदिर के रहस्य

बालाजी मंदिर के मुख्य द्वार के दरवाजे के दाईं ओर एक छड़ी रखी है। जिस छड़ी से बालाजी की बचपन में पिटाई की गई थी। और इसी वजह से उनकी थोड़ी में चोट लग गई। और तब से लेकर आज तक उनकी थोड़ी में चंदन का लेप लगया जाता है। ताकि घाव भर जाए। बालाजी के सिर पर आज भी रेशमी बाल हैं और उनमें उलझने नहीं आती और वह हमेशा ताजा लगते हैं। बालाजी को सजाने के लिए धोती और साड़ी का प्रयोग किया जाता है। उन्हें ऊपर साड़ी और नीचे धोती पहनाई जाती है।

बालाजी की पीठ को जितनी बार भी साफ करो, वहाँ गीलापन रहता ही है, वहाँ पर कान लगाने पर समुद्र घोष सुनाई देता है। बालाजी के वक्षस्थल पर लक्ष्मीजी निवास करती हैं। हर गुरूवार को निजरूप दर्शन के समय भगवान बालाजी की चंदन से सजावट की जाती है उस चंदन को निकालने पर लक्ष्मीजी की छवी उस पर उतर आती है। बाद में उसे बेचा जाता है। गर्भगृह में जलने वाले चिराग कभी बुझते नही हैं, वे कितने ही हजार सालों से जल रहे हैं किसी को पता भी नहीं है। बालाजी मंदिर में भगवान की मूर्ति की सफाई के लिए विशेष तरह का कपूर लगाया जाता है। यह कपूर जब पत्थर पर लगाया जाता है तब वह टूट जाता है। और बालाजी की मूर्ति पर लगाया जाता है तो ऐसा कुछ नहीं होता।

तिरुपति के दर्शनीय स्थल

श्री पद्मावती मंदिर- तिरुपति से पांच किलोमीटर दूर है। यह मंदिर भगवान वैंकटेश्वर की पत्नी श्री पद्मावती को समर्पित है। तिरुमला की यात्रा तब पूरी नहीं हो सकती जब तक इस मंदिर के दर्शन नहीं किए जाते।

श्री गोविंदराजस्वामी मंदिर-श्री गोविंदराजस्वामी भगवान बालाजी के बड़े भाई हैं। यह मंदिर तिरुपति का मुख्‍य आकर्षण है।

श्री कपिलेश्वरस्वामी मंदिर-यह तिरुपति का एकमात्र शिव मंदिर है। यह तिरुपति से तीन किलोमीटरदूर उत्तर में तिरुमला की पहाड़ियों के नीचे स्थित है। यहां पर कपिला तीर्थम नामक पवित्र झरना भी है। इसे अलवर तीर्थम के नाम से भी जाना जाता है।

आकाशगंगा वॉटरफॉल-आकाशगंगा वॉटरफॉल तिरुमला मंदिर से तीन किलोमीटर उत्तर में स्थित है। इसके जल से भगवान को स्‍नान कराया जाता है। पहाड़ी से निकलता पानी तेजी से नीचे घाटी में गिरता है। बारिश के दिनों में यहां का दृश्‍य बहुत की मनमोहक लगता है।

श्री वराहस्वामी मंदिर-तिरुमला के उत्तर में स्थित श्री वराहस्वामी का प्रसिद्ध मंदिर पुष्किरिणी के किनारे स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार वराह स्वामी को समर्पित है।

टीटीडी के मुख्य कार्य

टीटीडी का मुख्यालय तिरुपति में है और लगभग 16,000 लोग कार्यरत हैं। टीटीडी श्री वेंकटेश्वर भक्ति चैनल व सप्तगिरि पत्रिका का प्रकाशन करती है। टीटीडी द्वारा विभिन्न विवाह मंडप, डिग्री कॉलेज, कनिष्ठ कॉलेज और उच्च विद्यालयों भी चलाता है। इसके साथ ही श्री वेंकटेश्वर रामनारायण रुईया सरकारी जनरल अस्पताल,श्री वेंकटेश्वर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज,सरकारी प्रसूति अस्पतालों में टीटीडी एक प्रमुख हिस्सेदारी धारक के रूप में कार्य करता है।

श्री वेंकटेश्वर गोसंरक्षण शाला, जिसमें दान के रूप में प्राप्त पशुओं को रखा जाता है संचालित करती है। टीटीडी हर 30 मिनट में तिरुपति रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन से अलीपीरी और श्रीवारि मेट्टू तक मुफ्त बसें चलाती है। 12 ऐसी बसें हैं जो निर्धारित समय स्लॉट में हर 3 मिनट की आवृत्ति पर तिरुमला में कॉटेज, चॉक्री, मंदिर और अन्य स्थानों से गुज़रती हैं।

भक्तों द्वारा दिए गए दान हर महीने करीब 130 मिलियन के बराबर होते हैं। वहीं केश की नीलामी से हर वर्ष 200 करोड़ से अधिक प्राप्त होते हैं।


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