Thursday, 28 May 2020

क्रिकेट का उभरता सितारा मोक्ष मुर्गई

मोक्ष न केवल एक ऑल-राउंडर बल्लेबाज हैं, बल्कि एक ऑफ स्पिनर भी हैं




क्रिकेट भारत के गली मोहल्लों तक में खेले जाने वाला विश्वप्रसिद्ध खेल है। पूरी दुनिया के साथ-साथ ही इस खेल को भारत में पूजा जाता है। 
कई युवा प्रतिभाएं इस खेल में सफलता पाने के लिए निरंतर संघर्ष कर रहे हैं उन्हीं में से एक हैं मोक्ष मुर्गई। दिल्ली के एक युवा ऑलराउंडर मोक्ष मुर्गई उन प्रतिभाशाली क्रिकेटरों में से एक हैं, जो अपने शानदार प्रदर्शन और दृढ़ निश्चय के बलबूते पर पहचान बनाना चाहते हैं। भारत निश्चित रूप से ताजा युवा प्रतिभाओं का देश है जब क्रिकेट की बात आती है, और इस 20 वर्षीय युवक ने खुद को इस बात के लायक साबित किया है।  दाएं हाथ के बल्लेबाज मोक्ष मुर्गई ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर खुद को साबित भी किया है।  दिल्ली से संबंधित, मोक्ष एक राज्य-स्तरीय एथलीट है, जिसने अंतर-क्षेत्रीय (जिला) और ज़ोनल क्रिकेट खेलने के अलावा विभिन्न श्रेणियों में राष्ट्रीय खेल खेला है।  उनकी संख्या पूर्वोक्त स्तर पर उनकी क्षमता की अत्यधिक बात करती है। मोक्ष ने 7 साल की उम्र से क्रिकेट खेलना शुरू किया और अपने अब तक के 13 साल के करियर में 30 से अधिक शतक और 50+ अर्ध शतक बनाने का जबरदस्त प्रदर्शन किया।  मुर्गई डीएलडीएवी स्कूल, पीतमपुरा गए और स्कूल के लिए भी खेला।  अब मोक्ष दिल्ली विश्वविद्यालय के स्नातक हैं जहां वह DUSU 2019-2020 के खेल अध्यक्ष हैं और अपने कॉलेज क्रिकेट टीम के पैक का नेतृत्व कर रहे हैं।
अपने खेल को मजबूत बनाने के लिए मोक्ष का एक टाइट शेड्यूल है।  वह सुबह जल्दी उठता है, रोजाना 4-5 घंटे अभ्यास करता है, एक सख्त आहार का पालन करता है और अपनी फिटनेस को बनाए रखने के लिए जंक फूड से परहेज करता है। मोक्ष ने अपने कॉलेज के लिए कई टूर्नामेंट जीते हैं, जोनल और इंटर-जोनल स्तर पर क्रिकेट खेला है।  घरेलू सर्किट में उन्होंने अपने शानदार प्रदर्शन को दिखाते हुए कई रन बनाए हैं।  टूर्नामेंट के पिछले सीज़न में उन्होंने 1200 से अधिक रन बनाए।  मोक्ष न केवल एक ऑल-राउंडर बल्लेबाज हैं, बल्कि एक ऑफ स्पिनर भी हैं।  
मोक्ष ने विभिन्न श्रेणियों जैसे अंडर -14, अंडर -16 और अंडर -19 सीनियर्स में देश के लिए खेला है।  अपनी उपलब्धियों में शामिल मोक्ष ने 2018 में लखनऊ में एक टूर्नामेंट में भारत का प्रतिनिधित्व किया और रेलवे रणजी ट्रॉफी और अंडर -23 कैंप में भी भाग लिया।
मोक्ष अपनी मेहनत और लगन के साथ अपने खेल में लगा रहा है और निश्चित रूप से उसे कई पुरस्कार मिले हैं और इसमें उसने अपना नाम बनाया है।  इस निरंतर प्रयास ने उन्हें 2019-20 के लिए एसएच स्पोर्ट्स से एक प्रायोजन भी मिला।  मोक्ष मार्च 2019 में पीठ की गंभीर चोट से गुज़रे हैं जिसके कारण वह एक महीने तक मैदान पर नहीं आ सके।  लेकिन उन्होंने जल्द ही इसे पुनर्वसन सत्र और दैनिक फिटनेस करने और अपने भोजन को बनाए रखने से प्राप्त किया।  कभी-कभी स्वास्थ्य समस्याएं एक एथलीट के लिए एक बड़ी समस्या बन सकती हैं, लेकिन किसी को यह पता होना चाहिए कि इससे वापसी कैसे की जाए । मैदान पर वापस आने के बाद उन्होंने अपने शानदार खेल के लिए सभी को प्रभावित किया। मोक्ष ने अपने परिवार और कोचों द्वारा उन सभी प्रयासों के लिए धन्यवाद दिया, जो उन्होंने अपने सफर में पूरे किए।  आगे जब उनसे उनके जीवन मंत्र के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "हमेशा याद रखें कि आपका ध्यान आपकी वास्तविकता को निर्धारित करता है"।
मोक्ष ने एक मंत्र भी साझा किया जिसे सभी को पालन करना चाहिए- "अपने आप को धक्का दें, क्योंकि कोई और आपके लिए ऐसा करने वाला नहीं है"।

Friday, 15 May 2020

मदर्स डे पर विशेष :मां है तो सब कुछ है


सुजाता साहा 


आज मेरा फिर से मुस्कुराने का मन किया।

माँ की ऊँगली पकड़कर घूमने जाने का मन किया॥



उंगलियाँ पकड़कर माँ ने मेरी मुझे चलना सिखाया है।

खुद गीले में सोकर माँ ने मुझे सूखे बिस्तर पे सुलाया है॥



माँ की गोद में सोने को फिर से जी चाहता है।

हाथो से माँ के खाना खाने का जी चाहता है॥

लगाकर सीने से माँ ने मेरी मुझको दूध पिलाया है।



रोने और चिल्लाने पर बड़े प्यार से चुप कराया है॥

मेरी तकलीफ में मुझ से ज्यादा मेरी माँ ही रोयी है।



खिला-पिला के मुझको माँ मेरी, कभी भूखे पेट भी सोयी है॥



कभी खिलौनों से खिलाया है, कभी आँचल में छुपाया है।

गलतियाँ करने पर भी माँ ने मुझे हमेशा प्यार से समझाया है॥



माँ के चरणो में मुझको जन्नत नजर आती है।

लेकिन माँ मेरी मुझको हमेशा अपने सीने से लगाती है॥


मां को समर्पित कविता के साथ ये कहना चाहूंगी कि मदर्स डे बस एक जरिया है मां के लिए अपनी तरफ से कुछ कहने, करने के लिए। मदर्स डे की शुरुआत 1912 में अमेरिका से हुई थी। पूरी दुनिया में इसे मनाने की तारीख थोड़ी अलग है। मगर ज्यादातर देशों में मदर्स डे मई महीने के दूसरे रविवार को मनाया जाता है। इस साल मदर्स डे का सेलिब्रेशन 10 मई को मनाया जाएगा। कोरोना संक्रमण की वजह से शायद ये दिन फीकी-फीकी सी लगी। लेकिन लॉकडाउन की स्थिति में भी आप मदर्स डे का पूरा आनंद ले सकते हैं। लॉकडाउन का फायदा उठाएं और सारा दिन अपनी मां के साथ बिताए, अपने हाथों से खाना बनाकर स्पेशल तरीके से सर्व करें और उनका खूब सारा आशीर्वाद पाएं।

ईश्वर ने एक औरत को ही ये शक्ति दी है कि वो संसार में एक नया जीवन दे। मां बनना स्त्री जीवन की सार्थकता है। मां सिर्फ मां ही नहीं होती बल्कि अपने बच्चों की सबसे अच्छी दोस्त भी होती है। मां एक बच्चे को जन्म देती है और जीवनभर के लिए दोनों के दिल के तार जुड़ जाते हैं। मां हर पल अपने बच्चे के साथ रहती है।  मां के ऊपर घर, परिवार, पति और बच्चों की जिम्मेदारी होती है जिसे वे पूरी ईमानदारी से चौबीसों घंटों पूरे वर्ष दिन-रात निभाती है। सबसे के लिए करते करते वो खुद अपने लिए समय नहीं निकाल पाती है। निस्वार्थ सेवा का नाम है माँ। मां जो हमें चलने से लेकर हमारी सारी जिम्मेदारी खुद उठाती है। ये कहना मुनासिब होगा ....

गमों की भीड़ में जिसने हमें हंसना सिखाया था

वह जिसके दम से तूफानों ने अपना सिर झुकाया था है वो मां

मां संसार में ईश्वर का दिया हुआ एक ऐसा अनमोल उपहार है जिसका कोई मोल नहीं। मां के प्रति एक भाव जो सहज ही आपको सोशल मीडिया के जमाने में अक्सर देखने को मिल जाता होगा, जरुरत है मां के प्रति स्नेह और समर्पण की। क्योंकि मां है तो सब कुछ है...।

Friday, 6 December 2019

तिरुपति धार्मिक आस्था के साथ पर्यटन का भी एक बेहतर केंद्र

- सुजाता साहा

हमारे देश में धार्मिक पर्यटन की एक लंबी परंपरा है आज से कुछ साल पहले तक लोग चारों धामों की यात्रा पर या तो बहुत प्रसिद्ध मंदिरों, नदियों, हिमालय की ओर जाते थे। पर अब धीरे-धीरे धार्मिक यात्राओं के साथ-साथ कई तरह के पर्यटन पर लोग जाते हैं और उसमें पहाड़, नदी, बर्फीली जगह, समुद्र तथा कमर्शियल सेंटर, मनोरंजन स्थल, स्वास्थय केंद्र शामिल हैं। विदेशों में भी पर्यटन की अभिरूचि लोगों में तेजी से बढ़ी है। इस सबके बावजूद अभी भी कुछ धार्मिक स्थान है, जहां सर्वाधिक लोग अपनी धार्मिक आस्थाओं के साथ प्रकृति का आनंद लेने के लिए जाते हैं उनमें सर्वाधिक लोकप्रिय है तिरुपति बालाजी का मंदिर। यह मंदिर आंध्रप्रदेश में स्थित तिरूपति और नगर की जिस पहाड़ी पर मंदिर बना है उसे तिरूमला कहते हैं। इस पहाड़ी को शेषांचलम भी कहा जाता है। पहाड़ी सांप के आकार सी प्रतीत होती है, जिसकी सात चोटियां हैं जो आदि शेष के फनों की प्रतीक मानी जाती हैं। इन सात चोटियों के नाम क्रमश: शेषाद्रि, नीलाद्रि, गरू़डाद्रि, अंजनाद्रि, वृषभाद्रि, नारायणाद्रि और वैंकटाद्रि हैं। वैंकटाद्रि पर्वत में बालाजी का मंदिर है।

साल के 12 महीनों में एक भी दिन ऐसा नहीं जाता, जब बालाजी के दर्शन करने के लिए भक्तों का तांता न लगा हो। यह भारत के उन चुनिंदा मंदिरों में से एक है जिसके पट सभी धर्मानुयायियों के लिए हमेशा खुले हुए हैं। यह मंदिर भारत ही नहीं विश्व के सबसे अधिक तीर्थयात्रियों के आकर्षण का केंद्र है। इसके साथ ही इसे विश्व के सर्वाधिक धनी धार्मिक स्थानों में से भी माना जाता जहां रोजाना 25 हजार से ज्यादा लोग बालाजी के दर्शन करते हैं।

कैसा जाया जाए बालाजी?

तिरुपति चेन्नई से 130 किलोमीटर दूर स्थित है, जो एक मुख्य रेलवे स्टेशन भी है। यहां से रायपुर, विशाखापट्टनम, हैदराबाद, बेंगलुरु और चेन्नई के लिए सड़क व रेल व्यवस्था भी है। इसके साथ ही तिरुपति पर एक छोटा-सा हवाई अड्डा भी है। तिरुपति रेलवे स्टेशन से तिरूमला के लिए बस सुविधा उपलब्ध है। पैदल यात्रियों हेतु पहाड़ी पर चढ़ने के लिए तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम नामक एक विशेष मार्ग बनाया गया है। जब तिरुपति टोल से निकले तो सामानों को स्कैनिंग से गुजरना पड़ा। ऐसा सुरक्षा की दृष्टि से किया जाता है। अगर वहाँ के सुरक्षाकर्मियों को शक होगा तो वो समान की खोलकर भी तलाशी लेंगे। उसके पश्चात तिरुपति से तिरुमला की ओर घुमावदार सड़कों से होते हुए मनोरम प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेते हुए ऐसा प्रतीत होता है जैसे हम देवलोक में आ गये हैं, सुबह का वक्त हरियाली और बादलों के बीच चलने की अनुभूति देता हो बस... और हम तिरुमाला पहुँच गये। सबसे अच्छी बात यह है कि तिरुपति से तिरुमाला जाने का मार्ग अलग और आने का मार्ग अलग है, क्योंकि बहुत ही घुमावदार सड़कें हैं और बहुत सारे घाटी पार करना होते हैं।



श्रृद्धालु की सुविधा के लिए तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) ने इंटरनेट पर ऑनलाइन टिकट की व्यवस्था भी कराई है। https://ttdsevaonline.com/#/login जो बहुत जरूरी भी है। ऑनलाइन दर्शन और रूम बुकिंग कर लिया जाए, तो यात्रा सुखद होगी। नहीं तो तिरुपति पहुंच कर अगर आप हॉटल लेने की सोचे तो बता दूं तिरुमला में एक भी हॉटल नहीं है। वहां टीटीडी की सारी व्यवस्था देखता है। रूम लेने लंबी प्रक्रिया से गुजरना होगा। ऑनलाइन दर्शन का शुल्क 300 रुपए निर्धारित किया गया है| जिससे आपको 2-3 घंटे में बालाजी के दर्शन हो जाएंगे। साथ ही 2 लड्डू प्रसाद के भी मिलेंगे। शीघ्र दर्शन की रिपोर्टिंग करने जाये तो किसी भी प्रकार का लगेज, फ़ोन या अन्य कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण न ले जाये अन्यथा आपको परेशानी हो सकती है| हां अपना ऑनलाइन बुकिंग के रसीद का प्रिंटआउट, आधार कार्ड जरूर ले जाए अन्यथा दर्शन से वंचित हो सकते हैं।

मन्दिर प्रशासन ने पुरुषों के लिए ड्रेस कोड धोती – शर्ट या कुर्ता-पायजामा निर्धारित किया है वहीं महिलाओं के लिए साड़ी-सलवार सूट का प्रावधान है| दर्शन प्रवेश के बाद पूरा माहौल गोविंदामय हो जाता है। सभी श्रद्धालु गोविंदा-गोविंदा का जाप करते आगे बढ़ते जाते हैं। और स्वामीवारि के पुण्य दर्शन हो जाएंगे।

हमारी सुखद और अविस्मरणीय यात्रा

तिरुमला पहुंच कर हमने रूम जो ऑनलाइन बुक किया था, की चाबी लेकर लगेज रखकर केशदान के लिए गए। इस मंदिर में जो लोग दर्शन करने आते हैं वे अपने सिर के बालों को चढ़ाते हैं। यह बाल उनकी आर्थिक सहायता करते हैं। ताकि वे धन कुबेर का ऋण उतार सकें। मालूम हो कि पद्मावती से शादी के वक्त बालाजी ने कुबेर से ऋण लिया था। केशदान के अंतर्गत श्रद्धालु प्रभु को अपने केश समर्पित करते हैं जिससे अभिप्राय है कि वे केशों के साथ अपना  अभिमान, आंडबर ईश्वर को समर्पित करते हैं। मंदिर के पास स्थित 'कल्याण कट्टा' नामक स्थान पर यह सामूहिक रूप से संपन्न किया जाता है। यहां एक टोकन दिया जाता है और आधी ब्लेड, अंदर हाल में पहुँचे तो देखा कि बहुत सारे बाल काटने वाले वहाँ बैठे हुए हैं, और हमारे टोकन पर जिस बाल काटने वाले का नंबर लिखा हुआ था, हम भी उसके सामने लाईन में जाकर खड़े हो गये। और केशदान किया। केशदान के पश्चात यहीं पर स्नान करते हैं और फिर पुष्करिणी में स्नान के पश्चात मंदिर में दर्शन करने के लिए जाते हैं। वैसे अब जहां आपने रूम लिया वहां भी कल्याण कट्टा की व्यवस्था की गई है। ताकि आपको परेशानी न हो। यह सेवा फ्री है।

स्वच्छ भारत अभियान में शामिल तिरुपति

सबसे अच्छी बात तिरुमला में तमिल, तेलुगू, हिन्दी और अंग्रेजी में सभी तरह के संदेश लिखे हुए हैं, किसी से कुछ भी पूछने की जरुरत नहीं पड़ती है। और सफाई की बात की जाए तो... कहीं कचरा ही नहीं... इतना साफ-सुथरा शहर है तिरुपति। एक ओर जब देश के कुछ मंदिरों, धार्मिक स्थलों में जाते हैं तो वहां गंदगी और अव्यवस्था, पंडों की लूट के दृश्य देखते हैं तो हमारा मन खराब होता है किन्तु तिरुपति में हमें ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता है। तिरुपति को केंद्र सरकार की स्वच्छ भारत अभियान में शामिल किया गया है। तिरुमला में भक्तों के लिये सभी सुविधाएँ मुफ़्त उपलब्ध हैं या फ़िर बहुत ही कम दामों पर। तिरुमाला में बसें लगातार चलती रहती हैं, जिससे आप एक स्थान से दूसरे स्थान जा सकते हैं, वो भी मुफ़्त में, और बसें भी विशेष प्रकार की हैं, जैसे भगवान का खुद का रथ हो।



सर्वदर्शनम- सर्वदर्शनम से अभिप्राय है 'सभी के लिए दर्शन'। सर्वदर्शनम के लिए प्रवेश द्वार वैकुंठम काम्प्लेक्स है। वर्तमान में टिकट लेने के लिए यहां कम्प्यूटरीकृत व्यवस्था है। यहां पर निःशुल्क व सशुल्क दर्शन की भी व्यवस्था है। साथ ही विकलांग लोगों के लिए 'महाद्वारम' नामक मुख्य द्वार से प्रवेश की व्यवस्था है, जहां पर उनकी सहायता के लिए सहायक भी होते हैं।

अन्न प्रसाद व लड्डू प्रसाद

तिरुमला में चौबीसों घटें अन्न प्रसाद की व्यवस्था है जिसके अंतर्गत चरणामृत, मीठी पोंगल, दही-चावल जैसे प्रसाद तीर्थयात्रियों को दर्शन के पश्चात दिया जाता है। लड्डू मंदिर के बाहर बेचे जाते हैं, जो यहां पर प्रभु के प्रसाद रूप में चढ़ाने के लिए खरीदे जाते हैं। इन्हें खरीदने के लिए पंक्तियों में लगकर टोकन लेना पड़ता है। श्रद्धालु दर्शन के उपरांत लड्डू मंदिर परिसर के बाहर से खरीद सकते हैं। तिरुपति का सबसे प्रमुख पर्व 'ब्रह्मोत्सवम' है जिसे मूलतः प्रसन्नता का पर्व माना जाता है। 9 दिनों तक चलने वाला यह पर्व साल में एक बार सितंबर या अक्टूबर को मनाया जाता है।

यह मंदिर सबसे अमीर मंदिरों में से एक माना जाता है। यहां हर वर्ग के लोग बालाजी के दर्शन करने आते हैं। यहां फिल्मी सितारों से लेकर राजनेता आदि सभी दर्शन करने आते हैं। इस मंदिर को लेकर कई मान्यताएं विश्वास हैं। जिसकी वजह से यह इतना प्रसिद्ध है।

बालाजी मंदिर के रहस्य

बालाजी मंदिर के मुख्य द्वार के दरवाजे के दाईं ओर एक छड़ी रखी है। जिस छड़ी से बालाजी की बचपन में पिटाई की गई थी। और इसी वजह से उनकी थोड़ी में चोट लग गई। और तब से लेकर आज तक उनकी थोड़ी में चंदन का लेप लगया जाता है। ताकि घाव भर जाए। बालाजी के सिर पर आज भी रेशमी बाल हैं और उनमें उलझने नहीं आती और वह हमेशा ताजा लगते हैं। बालाजी को सजाने के लिए धोती और साड़ी का प्रयोग किया जाता है। उन्हें ऊपर साड़ी और नीचे धोती पहनाई जाती है।

बालाजी की पीठ को जितनी बार भी साफ करो, वहाँ गीलापन रहता ही है, वहाँ पर कान लगाने पर समुद्र घोष सुनाई देता है। बालाजी के वक्षस्थल पर लक्ष्मीजी निवास करती हैं। हर गुरूवार को निजरूप दर्शन के समय भगवान बालाजी की चंदन से सजावट की जाती है उस चंदन को निकालने पर लक्ष्मीजी की छवी उस पर उतर आती है। बाद में उसे बेचा जाता है। गर्भगृह में जलने वाले चिराग कभी बुझते नही हैं, वे कितने ही हजार सालों से जल रहे हैं किसी को पता भी नहीं है। बालाजी मंदिर में भगवान की मूर्ति की सफाई के लिए विशेष तरह का कपूर लगाया जाता है। यह कपूर जब पत्थर पर लगाया जाता है तब वह टूट जाता है। और बालाजी की मूर्ति पर लगाया जाता है तो ऐसा कुछ नहीं होता।

तिरुपति के दर्शनीय स्थल

श्री पद्मावती मंदिर- तिरुपति से पांच किलोमीटर दूर है। यह मंदिर भगवान वैंकटेश्वर की पत्नी श्री पद्मावती को समर्पित है। तिरुमला की यात्रा तब पूरी नहीं हो सकती जब तक इस मंदिर के दर्शन नहीं किए जाते।

श्री गोविंदराजस्वामी मंदिर-श्री गोविंदराजस्वामी भगवान बालाजी के बड़े भाई हैं। यह मंदिर तिरुपति का मुख्‍य आकर्षण है।

श्री कपिलेश्वरस्वामी मंदिर-यह तिरुपति का एकमात्र शिव मंदिर है। यह तिरुपति से तीन किलोमीटरदूर उत्तर में तिरुमला की पहाड़ियों के नीचे स्थित है। यहां पर कपिला तीर्थम नामक पवित्र झरना भी है। इसे अलवर तीर्थम के नाम से भी जाना जाता है।

आकाशगंगा वॉटरफॉल-आकाशगंगा वॉटरफॉल तिरुमला मंदिर से तीन किलोमीटर उत्तर में स्थित है। इसके जल से भगवान को स्‍नान कराया जाता है। पहाड़ी से निकलता पानी तेजी से नीचे घाटी में गिरता है। बारिश के दिनों में यहां का दृश्‍य बहुत की मनमोहक लगता है।

श्री वराहस्वामी मंदिर-तिरुमला के उत्तर में स्थित श्री वराहस्वामी का प्रसिद्ध मंदिर पुष्किरिणी के किनारे स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार वराह स्वामी को समर्पित है।

टीटीडी के मुख्य कार्य

टीटीडी का मुख्यालय तिरुपति में है और लगभग 16,000 लोग कार्यरत हैं। टीटीडी श्री वेंकटेश्वर भक्ति चैनल व सप्तगिरि पत्रिका का प्रकाशन करती है। टीटीडी द्वारा विभिन्न विवाह मंडप, डिग्री कॉलेज, कनिष्ठ कॉलेज और उच्च विद्यालयों भी चलाता है। इसके साथ ही श्री वेंकटेश्वर रामनारायण रुईया सरकारी जनरल अस्पताल,श्री वेंकटेश्वर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज,सरकारी प्रसूति अस्पतालों में टीटीडी एक प्रमुख हिस्सेदारी धारक के रूप में कार्य करता है।

श्री वेंकटेश्वर गोसंरक्षण शाला, जिसमें दान के रूप में प्राप्त पशुओं को रखा जाता है संचालित करती है। टीटीडी हर 30 मिनट में तिरुपति रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन से अलीपीरी और श्रीवारि मेट्टू तक मुफ्त बसें चलाती है। 12 ऐसी बसें हैं जो निर्धारित समय स्लॉट में हर 3 मिनट की आवृत्ति पर तिरुमला में कॉटेज, चॉक्री, मंदिर और अन्य स्थानों से गुज़रती हैं।

भक्तों द्वारा दिए गए दान हर महीने करीब 130 मिलियन के बराबर होते हैं। वहीं केश की नीलामी से हर वर्ष 200 करोड़ से अधिक प्राप्त होते हैं।


Tuesday, 24 September 2019

आज की जनधाराः 33 वर्ष की सेवावधि के पश्चात रिटायरमेंट के निर्णय से बेचैन है ब्यूरोक्रेसी

छत्तीसगढ़ के बहुत से आईएएस, आईपीएस, आईएफएस लाभ-हानि के गणित में उलझे
- सुजाता साहा
रायपुर, 24 सितंबर 2019। यूपीएससी यानी भारतीय लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग और परीक्षा माध्यमों से चयनित होने वाले ऐसे कर्मचारी-अधिकारी जो आईएएस, आइपीएस, आइएफएस आरएसएस व भारत सरकार की अन्य सेवाओं में सैन्यबल इत्यादि में हैं, जिनकी आयु 60 वर्ष होती है वो सेवानिवृत्त होते हैं। हाल ही में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि केंद्र सरकार अपना स्थापना व्यय कम करने, युवाओं को रोजगार देने और भारतीय सेवा में विशेषज्ञ लोगों को सीधे लाने के लिए सेवानिवृत्त की आयु को 60 वर्ष को यथावत रखते हुए सेवा अवधि की आयु को अधिकतम 33 वर्ष करने पर विचार कर रही है। यानी ऐसे कर्मचारी-अधिकारी जिन्होंने कम उम्र में भारत सरकार की सेवा को ज्वाइन किया था, वे 60 वर्ष के
आयु के पहले ही 33 वर्ष सेवा देकर सेवानिवृत्त हो जाएंगे। छत्तीसगढ़ सहित अलग-अलग राज्यों और केंद्र में कार्यरत अधिकारियों में इन दिनों सेवानिवृत्ति की आयु को लेकर बेहद बैचेनी और सुगबुगाहट है। सूत्रों से आ रही खबरों को माने तो केंद सरकार केंद्रीय अधिकारियों, कर्मचारियों की सेवा अवधि
की आयु 33 वर्ष या सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष जो भी कम है, करने जा रही है। इस आशय का जिक्र सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों में भी है। भारत सरकार का कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग
(डीओपीटी) द्वारा तैयार प्रस्ताव के अनुसार ऐसा करने से बैकलॉग की समस्या दूर होगी और पदोन्नति के नए अवसर के साथ रोजगार की नई संभावनाएं पैदा होगी। बहुत से अधिकारी कर्मचारी जो लंबे समय से पदोन्नति की बांट जोह रहे हैं उन्हें भी पदोन्नति के अवसर मिलेंगे। केंद्र सरकार यदि आशय का फैसला लेती है, तो इसका सबसे ज्यादा असर हमारे देश की सुरक्षा बल सेवा से जुड़े जवानों, अधिकारियों पर पड़ेगा। सामान्यत सुरक्षा बल में 22 साल की आयु में भर्ती हो जाती है।
डीओपीटी के सूत्रों के मुताबिक, यह योजना कई चरणों में लागू की जाएगी। वित्त विभाग से अनुमति मिलने के उपरांत अगले वित्तीय वर्ष यानी अप्रैल 2020 में सेवानिवृत्ति के नए नियम लागू किए जा सकेंगे। जो लोग देश की ब्यूरोक्रेसी की लॉबिंग की ताकत को जानते हैं, उन्हें इसमें संदेह है। मोहली समिति की रिपोर्ट के आधार पर की जानेवाली इस अनुशंसा को लागू नहीं होने दिया जाएगा। शेष पृष्ठ 7 पर
डीओपीटी द्वारा जारी 2018 की ग्रेडेशन लिस्ट के अनुसार 2003 तक के बैच के आईएएस, आईपीएस, आईएफएस
अधिकारी प्रभावित होंगे, उन्हें होने वाले लाभ हानि।
प्रभावित होने वाला सेनाबल
भारतीय सेना में जनरल की सेवानिवृत्ति आयु 62 साल है, लेफ्टिनेंट जनरल की 60 साल, मेजर जनरल की 58 साल, ब्रिगेडियर की 56 साल, कर्नल और सूबेदार मेजर की 54 साल. सुबेदार और नायब सूबेदार की 52 साल, हवलदार और नायक की 49 साल, सिपाही जीपी (वाई) की 48 साल और सिपाही जीपी (एक्स) की सेवानिवृत्ति आयु 42 साल है। इंडियन नेवी में एडमिरल की सेवानिवृत्ति आयु 62 साल है, वाइस एडमिरल की 60 साल, रीयर एडमिरल की 58 साल, कोमोडोर कैप्टन, एजुकेशन और एमसीपीओ 1,2 की 57 साल, कोमोडोर /कैप्टन की 56 साल, कमांडर की 54 साल और लेफ्टिनेंट कमांडर एवं इसके नीचे और सीपीओ एवं इसके नीचे रैंक वाले सेलर की सेवानिवृत्ति आयु 52 साल है। इंडियन एयरफोर्स में एयरचीफ मार्शल की सेवानिवृत्ति आयु 62 साल है, एयर मार्शल की 60 साल, एयर वाइस मार्शल की 58 साल, एयर कोमोडोर फ्लाइंग ब्रांच की 56 साल और ग्रुप कैप्टन (सेलेक्ट) फ्लाइंग ब्रांच की सेवानिवृत्ति आयु 54 साल है।
याचिका के निर्णय पर अभी तक क्रियान्वयन नहीं
इस संबंध में 31 जनवरी 2018 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक सेवानिवृत्त अधिकारी देव शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया गया है, जिसमें कहा गया था कि गृह मंत्रालय चार माह में तय करे कि सभी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में सभी रैंकों में सेवानिवृत्ति की उम्र समान हो। अभी तक केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल सीआरपीएफ, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस आईटीबीपी, सीमा सुरक्षा बल बीएसएफ% तथा सशस्त्र सीमा बल एसएसबी में कमांडेंट से नीचे के पदों पर जवान 57 साल की उम्र में रिटायर हो जाते हैं। न्यायालय की समय सीमा के बावजूद अभी तक इस संबंध में कोई नीतिगत निर्णय नहीं लिया गया है।
छत्तीसगढ़ भी अछूता नहीं
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 4 साल पहले ही अपने कर्मचारी-अधिकारी की सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष कर दी गई है। छत्तीसगढ़ संविदा नियम में भी संशोधन कर सेवानिवृत्ति उपरात संविदा की आयु 72-75 वर्ष तक की जा चुकी है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार आने के उपरांत संविदा नियुक्ति समाप्त करने को लेकर काफी चर्चा हुई, किन्तु सरकार इस मामले में कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाई। अभी भी बहुत से कार्यालयों में महत्वपूर्ण लाभ के पदों पर सेवानिवृत्त लोग पदस्थ हैं।


 

Tuesday, 3 May 2016

नई सोच को सलाम


Start & ENd



सफर के दौरान

बस, ट्रेन में सफर के दौरान अक्सर देखने में आता है कि माता-पिता अपने बच्चों को खिड़की के पास खड़ा कर देते हैं, बच्चे या तो हाथ बाहर निकालते है या बाहर झांककर देखते हैं, जो कभी खतरनाक भी हो सकता है। कोई दुर्घटना होने पर लापरवाही हमारी होते हुए भी हम सामने वाले को इसका दोषी बताते हैं.... ऐसा क्यों? हमें सफर के दौरान हमेशा सावधानी बरतना चाहिए, और अगर किसी को देखे तो चुप ना बैठे उन्हें भी समझाएं कि वो ऐसा न करें। 

जोड़ी बनी रहे...

खबरों के अनुसार छोटे पर्दे के हिट शो चक्रवर्ती अशोक सम्राट में अशोक की भूमिका में नजर आने वाले मोहित रैना एक बार फिर अपनी गर्ल फ्रेंड मौनी रॉय के साथ काम करना चाहते हैं। मोहित रैना का कहना है कि मौनी रॉय के साथ उनका तालमेल अच्छा रहा है और अगर मौका मिलता है तो वह उनके साथ फिर काम करना पसंद करेंगे। मोहित ने 2011 में टीवी सीरियल देवों के देव महादेव में शिव की भूमिका की थी जिसमें उनके साथ मौनी ने भी काम किया था। वैसे मौनी अभी नागिन सीरियल के चलते इंडस्ट्री में छाईं हुई हैं।
सूत्रों के मुताबिक नागिन में मौनी के को-स्टार अर्जुन बिजलानी संग बढ़ रही नजदीकियों के कारण मौनी और मोहित में कई झगड़े भी हो रहे हैं। ऐसे में मोहित का यह कहना कि उन्हें फिर से मौनी के साथ काम करना अच्छा लगेगा, यह बात दोनों के फैन्स के लिए अच्छी खुशखबरी है। मेरी तो ईश्वर से यही कामना है कि आप दोनों की जोड़ी भोलेनाथ की कृपा से सच में बन जाए। खोया हुआ प्यार जिसे मिलता है वो खुशनसीब होता है। 

Sunday, 17 April 2016

कब सुधरेंगे हम?


केरल के पुत्तिंगल मंदिर में पिछले दिनों आग लगने से काफी नुकसान हुआ। करीब 120 लोगों की मौत और सैकड़ों घायल हुए। पटाखे जलाने से हुए इस हादसे से हमें सबक लेना चाहिए, आखिर हम अपनी मनमानी कब तक करेंगे? हम मंदिर मन की शांति, आत्मशुद्धि के लिए जाते और ईश्वर शांतिप्रिय होते हैं, शोरगुल से दूर एकांत मेें वास करते हैं, तो फिर पटाखे जलाने का यह कैसा रिवाज है? क्या इससे ईश्वर नाराज नहीं होते? ईश्वर का घर (मंदिर) के आसपास पटाखे जलाना वर्जित है, लेकिन नियम तोडऩा हमारी फितरत बन चुकी है। जब भी नियम तोड़ा जाएगा, ऐसा हादसा जरूर होगा। 

Friday, 15 April 2016

 जंगल बुक और कलाकारों की आवाज

जंगलों में रहने वाले एक लड़के की कहानी पर आधारित जंगल बुक देखते वक्त जब शेर खान पहली बार पर्दे पर आता है और नाना पाटेकर की आवाज कानों में पड़ती है तब थोड़ी देर के लिए ही सही आप दहशत में आ जाते हैं। शेरखान के रूप में नाना की आवाज दमदार लगती है। जंगल बुक के हिंदी वर्जन में सभी कलाकारों की आवाजों ने फिल्म में जान डाल दी है। सूत्रों के अनुसार फिल्म की बॉक्स ऑफिस कमाई में मूल अंग्रेजी संस्करण से ज्यादा बड़ा योगदान डबिंग वर्जन का है।
शेरखान के अलावा पंजाबी बल्लू भालू की आवाज में इरफान खान को सुनकर उनकी कला के मुरीद हो जाएंगें। वहीं बघीरा की आवाज में गंभीरता लाने का काम ओम पुरी ने बखूबी निभाया हैं, वहीं चंद मिनटों के लिए का  (अजगर) की आवाज में प्रियंका चोपड़ा सम्मोहित कर देती हैं।
फिल्म में अच्छे खाने और जिंदगी से प्यार करने वाले बल्लू भालू सबसे ज्यादा पसंद आया, बल्लू को शहद बहुत पसंद है और वह मोगली के जुगाड़ से काफी शहद इकट्ठा भी कर लेता है। मोगली के किरदार में नील  सेठी की काफी मेहनत झलकती है।


Tuesday, 9 June 2015

मोदी के ढाका प्रवास के मौके पर यहां बसे बांग्लादेशियों से चर्चा


- सुजाता साहा
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बांग्लादेश प्रवास से जहां भारत और बांग्लादेश में संबंध मजबूत हुए हैं, वहीं बांग्लादेश से भारत आए, और छत्तीसगढ़ के माना में बसाए गए शरणार्थियों की वो पुरानी भूलीबिसरी यादें ताजा हो गई। उन यादों को याद करते हुए उनकी आंखें नम हो जाती है। उनकी यादें और वतन एवं अपनों से बिछुडऩे का दु:ख भी था और नया जीवन की शुरूआत करने का सुखद आनंद भी। 
पचपन हजार शरणार्थियों में अब केवल 16-17 परिवार ही बचे हैं। ये परिवार 1971 में बांग्लादेश बनने के वक्त वहां से भारत आए शरणार्थी परिवारों से अलग हैं, और ये उसके काफी पहले 1964 में वहां के साम्प्रदायिक दंगों के बाद विस्थापित, और सरहद पार करके भारत आए हुए लोग हैं। राजधानी रायपुर के विमानतल के बगल की माना बस्ती में बसे हुए जिन परिवारों से बात हुई, वे 1971 के नहीं, बल्कि 1964 में आए हुए हैं। शुरूआती संघर्ष भरी जीवन यात्रा की गाथा सुनाते शरणार्थियों से बातचीत के अंश। 
नारायण सिंह मंडल
रिटायर्ड एलआईसी कर्मचारी नारायण सिंह मंडल (65) 1964 में पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से भारत आए थे। ढाका नीमतली में उनका जन्म हुआ था। एक साल ढाकेश्वरी में रहे। वर्ष 1964 में जब पूर्वी पाकिस्तान में सांप्रदायिक दंगा हुआ उस समय वे 12 बरस के थे। पिता की दंगे में मौत के बाद उनकी मां भवानी मंडल अपने तीन बच्चों और नाती के साथ भारत में शरण ली। 
मंडल ने प्रमाण-पत्र दिखाते हुए कहा कि वे रजिस्टर्ड शरणार्थी हैं। उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से अनुरोध पर भारत में शरण मिली। उन्होंने बताया कि जिनके पास आरआर नंबर है वो सही शरणार्थी है और जिनके पास नहीं है वे अवैध रूप से यहां रह रहे हैं। 
नारायण मंडल ने बताया कि पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दू-मुस्लिम मिलकर रहते थे। पूजा-पाठ या कोई भी सांस्कृतिक कार्यक्रम वे मिलकर ही मनाते थे। हर काम में मुस्लिम हिंदुओं का सहयोग करते थे। उन्होंने बताया कि 1947 में दंगे के तीन दिन बाद उन्हें समझ आया कि दंगा धर्म के नाम पर हुआ और देश का बंटवारा हो गया। इसी तरह 1952 में बांग्ला को राष्ट्रीय भाषा घोषित करने के लिए दंगा हुआ था। 
उन्होंने बताया कि वर्ष 1964-65 में बंगाल में अशांति फैली थी, मिल मजदूर अपनी 14 सूत्रीय मांगों को लेकर हड़ताल पर चले गए थे। इस हड़ताल को खत्म करने के लिए झूठी अफवाह फैलाई गई कि हजरत मोहम्मद साहब का बाल चुरा लिया गया है। इस अफवाह के चलते दंगा और बढ़ गया। करीब 55 हजार परिवारों ने बांग्लादेश से आकर भारत में अस्थाई कैंप में शरण ली। सरकार द्वारा इन्हें जमीन आदि देकर पुनवार्सित किया गया। मंडल ने बताया-मेरी नौकरी की वजह से मुझे रहने के लिए जमीन नहीं दी गई। 
मंडल ने बताया कि जब वे बांग्लादेश से आए, तो उनके पास कुछ भी नहीं था, इसलिए वे यहां शरणार्थी बनकर रहने लगे। जब वे यहां आए तो वे 5वीं में थे। आगे की पढ़ाई उन्होंने सरकार द्वारा संचालित स्कूल में पूरी की। माना के बारे में उन्होंने बताया कि यहां पहले 32 ब्लॉक थे। ब्रिटिश काल के मकान भी मौजूद थे, जहां चिकित्सालय, शिक्षा की व्यवस्था की गई थी, जो आज भी मौजूद है। सोशल सर्विस सर्टिफिकेट दिखाते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 1971 में भी यहां 25 हजार परिवार शरणार्थी बने। उनकी मदद करने पर उन्हें यह प्रमाण पत्र मिला। 
ढाकेश्वरी मंदिर के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि एक शक्ति पीठ होने की वजह से मंदिर प्रसिद्ध है। यहां काली और दुर्गा मंदिर हैं। दुर्गा मंदिर अधिक प्रसिद्ध है, जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुर्गा माता के दर्शन कर आशीर्वाद लिया है। 
जगदीश दास
माना स्थित मात्री मिष्ठान भंडार के संचालक जयदीश दास (69), बांग्लादेश के बोरीसाल जिला के निवासी सोलह साल की उम्र में यहां अपनी मां व 6 अन्य लोगों के साथ शरणार्थी बनकर पहुंचे थे। उन्होंने बताया कि भारत में शांति है। सांप्रदायिक दंगों की वजह से पूर्वी पाकिस्तान में उस समय भय और आतंक का माहौल था। 
उन्होंने बताया कि 1964 में जब दंगे हुए तो, हम 6 दिनों तक छुपते-छुपाते रहे। वहां हमें स्थानीय बंगाली, मुसलमान साथियों ने बचाया। भावुक होकर श्री दास ने बताया कि उनके आंखों के सामने किस तरह से उनके साढू भाई की चाकू से गोद-गोदकर हत्या कर दी गई। कई लोगों की लाशें यूं ही बिखरी हुई थीं। किसी तरह फौजियों ने उन्हें बचाया। जब वे कलकत्ता (कोलकाता) आए तो, स्पेशल टे्रन से रायपुर आने में 6 दिन लग गए। 
बांग्लादेश वापस जाने के सवाल में उन्होंने कहा कि जितने भी शरणार्थी यहां आए वे वापस बांग्लादेश नहीं जाना चाहेंगे, क्योंकि वे भारत सरकार की मदद व अपनी सोच, मेहनत के सहारे काफी सक्षम हो गए है। उन्होंने बताया कि हमारा परिवार बढ़कर 32 हो गया है। सबका अपना काम-धंधा है और सभी आर्थिक रूप से सक्षम हैं। 
श्री दास ने बताया कि शरणार्थियों को यहां तीन कैटेगरी में रखा गया था, एक पीएल, दूसरा एग्री और एसटी। पीएल के तहत अनाथ लोगों को सहारा दिया गया। एग्री के तहत जमीन और एसटी के तहत दुकान आदि दी गईं। हमें 4100 रुपए और 5500 मूल्य की दुकान दी गई थी। उन्होंने बताया- हम जमीन-जायदाद सब छोड़कर ऐसे ही यहां आ गए। और अपनी मेहनत से आज फिर तरक्की कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अब यहां सिर्फ 16-17 पुराने परिवार ही बचे हैं। 
उन्होंने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि माहौल इतना खराब हो गया था कि महिलाएं सुरक्षित नहीं थीं। कब क्या घटित हो जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता था। रूआंसा होते हुए उन्होंने कहा कि पत्नी आज भी रात को डरकर उठ जाती है और रोती है। बहुत बुरे दिन थे। 
श्यामलाल डे
माना निवासी सब्जी विक्रेता 80 बरस के श्यामलाल डे 27 साल की उम्र में 15-16 लोगों के साथ भारत आए थे। पिता की मिठाई की बहुत बड़ी दुकान थी और वे खुद ढाके मिल में काम करते थे। 
'मिल में रहने की वजह से हम सब बच पाए और अपना सब कुछ छोड़कर वहां से भारत आ गए।Ó 
श्यामलाल डे के भतीजे दिलीप डे ने बताया कि 2 साल की उम्र में यहां आए, कुछ याद नहीं था, लेकिन दादा-दादी वहां के माहौल के बारे में बताते थे कि हिन्दुओं पर वहां बहुत अत्याचार होता था। मोदी के बांग्लादेश प्रवास के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि मोदी के बांग्लादेश जाने से वहां के निवासियों को काफी फायदा होगा। उन्होंने मोदी के बांग्लादेश यात्रा के दौरान दिए भाषण के बारे में कहा कि पूरा परिवार एक साथ उनका संबोधन सुन रहा था। ऐसा लगा मानो हम वहीं हैं। 
श्यामलाल डे की पत्नी सप्तमी डे ने बताया कि शादी के 35 साल बाद करीब 11 साल पहले अपने पिता से मिलने वह बांग्लादेश गई थी। सप्तमी डे भी अपने मामा मोनी महतो के साथ भारत में शरण ली थी। ढाकेश्वरी मंदिर के बारे में पूछने उन्होंने बताया कि घर के पास होने के कारण ढाकेश्वरी दुर्गा मंदिर तो हम हर रोज जाया करते थे, भोग खाने के लिए। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश में उनकी 3 बहनें रहती हंै। पत्राचार तो नहीं हां फोन से सभी से बातचीत होती रहती है। उन्होंने बताया कि 1966 में उनकी शादी श्यामलाल डे के साथ हुई। उन्होंने बताया कि ढाकेश्वरी मंदिर के नाम से ही ढाका जिले का नाम रखा गया था। 
हरिनारायण मंडल 
माना निवासी हरिनारायण मंडल (50) ने बताया कि वे 2 बरस के थे तब माता-पिता यहां आए थे। शुरू से यहां रहने के कारण हमें यहां की नागरिकता मिल गई है। माता-पिता रजिस्टर्ड शरणार्थी थे। उनका परिवार भी दंगे में सबकुछ गवां कर यहां आया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बांग्ला संबोधन सुनकर दिल गद-गद हो गया। 'हम काफी खुश होंगे, अगर बांग्लादेश वासियों को भारतीय नागरिकता मिल जाए।Ó
एल एम विश्वास 
व्यवसायी एल एम विश्वास (58) ने बताया कि 1964 के सांप्रदायिक दंगे की वजह से उनका परिवार (माता-पिता, 5 भाई-बहन) ने यहां शरण ली थी। उनके साथ और भी कई लोग यहां आए, जिनमें से कुछ पंखाजूर में रहते हैं। वहां उन्हें रहने व खेती के लिए जमीन दी गई है। उन्होंने बताया कि एसटी कैटेगरी के तहत माना में लोगों को दुकान दी गई हैं। 
उन्होंने बताया कि उस वक्त के अविभाजित पाकिस्तान के फौजी तानाशाह याहया खान ने पूर्वी पाकिस्तान के इलाके में दंगा करवाया था। भारत सरकार ने शरणार्थियों की पूरी मदद की। 'मुझे सरकारी नौकरी भी लगी थी, लेकिन सिर्फ 1600 रुपए वेतन होने के कारण मैंने नौकरी छोड़कर अपना खुद का व्यवसाय किया।Ó नागरिकता के सवाल में उन्होंने कहा कि इतने वर्षों से यहां रह रहे हैं तो यहां की नागरिकता मिल ही गई है। 
विश्वास की पत्नी शामली विश्वास ने बताया-हमारा परिवार भी यहां शरणार्थी के तौर पर निवास कर रहा था। मेरी शिक्षा सरकार द्वारा संचालित स्कूल में ही हुई है। दोनों परिवार की पसंद से हमारी शादी हुई थी। 

Thursday, 8 May 2014

the Adventures of Dog & her Ele- Friend








Cutest canines

Dogs are our faithful friends so we wanted to share the love for all the canines in the world today. Here are some of the cutest ones we found. Enjoy!













Saturday, 26 April 2014

Instantly Fabulous



An amazing panoramic


An amazing panoramic photograph (known as a stereographic projection) captured by Greek photographer Chris Kotsiopoloulos during an intense 30-hour photo shoot in Sounio, Greece. It's comprised of hundreds of photos stitched from day to night - and reminds us of something the Little Prince might call home.

Awww yissss, icecream......


इंसान ही नहीं जानवर भी इस गर्मी से परेशान है, जिस तरह हम आइसक्रीम खाकर सुकून महसूस करते हैं, वैसे ही यह डॉगी भी आइसक्रीम का लुत्फ उठा रहा है।